भारत की क्लीन एनर्जी की राह में बड़ी रुकावट: ज़रूरी खनिजों की सप्लाई का भारी घाटा

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AuthorAditya Rao|Published at:
भारत की क्लीन एनर्जी की राह में बड़ी रुकावट: ज़रूरी खनिजों की सप्लाई का भारी घाटा

भारत अपनी रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ (Rare Earth) जैसे ज़रूरी खनिजों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। ग्लोबल सप्लाई चेन का चीन जैसे देशों पर केंद्रित होना, घरेलू उद्योगों के लिए बड़ा रणनीतिक जोखिम पैदा कर रहा है।

भारत अपने रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) के लक्ष्यों को हासिल करने और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) को बड़े पैमाने पर अपनाने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। इन महत्वाकांक्षी योजनाओं के लिए लिथियम, कोबाल्ट, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ (Rare Earth) जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की लगातार सप्लाई बेहद ज़रूरी है। ये खनिज बैटरियां, विंड टरबाइन मैग्नेट और इलेक्ट्रिक मोटर बनाने के काम आते हैं। हालाँकि, वैश्विक बाज़ार की मौजूदा स्थिति भारत की ऊर्जा योजनाओं के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रही है।

वैश्विक सप्लाई का केंद्रीकरण और रिफाइनिंग में दबदबा

दुनिया भर में इन खनिजों का उत्पादन कुछ ही देशों में सिमटा हुआ है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, कोबाल्ट, रेयर अर्थ और लिथियम जैसे प्रमुख खनिजों की वैश्विक सप्लाई का 80% से 90% तक हिस्सा सिर्फ तीन देश नियंत्रित करते हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि इन कच्चे खनिजों को औद्योगिक उपयोग लायक बनाने की रिफाइनिंग (Refining) प्रक्रिया में चीन का दबदबा है। यह एकाग्रता कुछ ही देशों को वैश्विक कीमतों और सप्लाई की उपलब्धता पर भारी बढ़त देती है, जिससे आयात करने वाले देशों के लिए सप्लाई में रुकावट का खतरा पैदा होता है।

औद्योगिक विस्तार के लिए रणनीतिक जोखिम

भारत ने 2030 तक 500 GW रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है, साथ ही इलेक्ट्रिक व्हीकल के उत्पादन को तेजी से बढ़ाने की योजना है। देश इन खनिजों का घरेलू उत्पादन बहुत कम करता है और उसकी रिफाइनिंग क्षमता भी सीमित है। इस वजह से, औद्योगिक क्षेत्र अचानक होने वाले निर्यात प्रतिबंधों या वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील है। अमेरिका या जापान जैसे देश, जिन्होंने रणनीतिक खनिज भंडार और सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए भारी निवेश किया है, की तुलना में भारत अभी भी ऐसे बफर बनाने की शुरुआती दौर में है।

नीति और साझेदारी की चुनौतियाँ

हालांकि भारत ने अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों में संसाधन सुरक्षित करने के लिए द्विपक्षीय साझेदारी की खोज शुरू कर दी है, लेकिन इन प्रयासों की गति चिंता का विषय बनी हुई है। इन संसाधनों के लिए वैश्विक बाज़ार बेहद प्रतिस्पर्धी है, और प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं पहले से ही लंबी अवधि के सप्लाई समझौते कर चुकी हैं। विश्लेषकों का कहना है कि भारत में रेयर अर्थ के भंडार तो हैं, लेकिन आयात पर निर्भरता कम करने के लिए इन सामग्रियों का प्रभावी ढंग से खनन और प्रतिस्पर्धी लागत पर प्रसंस्करण (Processing) करना आवश्यक है। यदि इसमें तेजी नहीं दिखाई गई, तो निर्माताओं के लिए लागत बढ़ सकती है, जिससे इलेक्ट्रिक व्हीकल और रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टरों के मुनाफे पर दबाव आ सकता है।

निवेशकों को क्या देखना चाहिए

निवेशकों के लिए, इस खनिज निर्भरता का दीर्घकालिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार और निजी कंपनियां इन चुनौतियों से कैसे निपटती हैं। भविष्य में खनिज अन्वेषण (Exploration) से संबंधित नीतिगत घोषणाएं, घरेलू रिफाइनिंग क्षमता के लिए सरकारी सब्सिडी, और स्थिर सप्लाई चेन सुनिश्चित करने के लिए राजनयिक प्रयासों की सफलता जैसे कारक महत्वपूर्ण होंगे। क्लीन एनर्जी की ओर बदलाव एक बहु-वर्षीय प्रवृत्ति है, और भारतीय कंपनियों की अपनी सप्लाई चेन को स्थानीयकृत (Localize) करने की क्षमता लागत-दक्षता (Cost-efficiency) और दीर्घकालिक व्यावसायिक स्थिरता बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण कारक साबित होगी।

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