भारत को सेमीकंडक्टर हब बनाने का सपना पावर इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के चलते मुश्किलों में घिरता दिख रहा है। चिप फैक्ट्रियों को 'सिक्स नाइन' यानी 99.9999% तक बिजली की सप्लाई चाहिए, लेकिन देश का ग्रिड वोल्टेज की उतार-चढ़ाव और महंगे इंडस्ट्रियल टैरिफ से जूझ रहा है। इससे कंपनियों को अपने पावर प्लांट पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है, जिसका असर शुरुआती मुनाफे पर पड़ सकता है।
क्या हुआ?
भारत सरकार 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन' के तहत देश को सेमीकंडक्टर निर्माण का एक बड़ा ग्लोबल हब बनाने के लिए ज़ोर-शोर से जुटी है। लेकिन, इस प्लान के सामने एक बड़ी तकनीकी बाधा आ खड़ी हुई है: देश का मौजूदा पावर इंफ्रास्ट्रक्चर चिप फैब्रिकेशन की खास ज़रूरतों के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं है। सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग के लिए इंडस्ट्री में 'सिक्स नाइन' (Six Nines) यानी 99.9999% तक बिजली की विश्वसनीयता की ज़रूरत होती है। बिजली में एक पल का भी उतार-चढ़ाव, जो शायद हमारी आंखों को दिखे भी नहीं, लाखों रुपये के सिलिकॉन वेफर्स को बर्बाद कर सकता है, जिससे भारी प्रोडक्शन लॉस हो सकता है।
निवेशकों के लिए यह क्यों मायने रखता है?
सेमीकंडक्टर प्लांट लगाने वाली कंपनियों, जैसे Tata Electronics या Micron Technology और CG Power जैसी फर्मों के ज्वाइंट वेंचर्स के निवेशकों के लिए, बिजली सिर्फ एक यूटिलिटी नहीं, बल्कि एक बड़ा ऑपरेशनल रिस्क है। चिप फैब्रिकेशन प्लांट बहुत ज़्यादा एनर्जी इस्तेमाल करते हैं। पब्लिक ग्रिड में ट्रांसमिशन लॉस और वोल्टेज में कभी-कभी आने वाली गिरावट के चलते, ये कंपनियां सामान्य बिजली सप्लाई पर भरोसा नहीं कर सकतीं। इन्हें हैवी इन्वेस्टमेंट कैप्टिव पावर प्लांट (captive power plants), इंडस्ट्रियल-ग्रेड बैकअप सिस्टम और डेडिकेटेड सबस्टेशन में करना पड़ रहा है। इससे शुरुआती कैपिटल स्पेंडिंग (capex) और लगातार चलने वाले ऑपरेटिंग खर्चे दोनों बढ़ जाते हैं, जो प्रोडक्शन के शुरुआती सालों में प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बना सकते हैं।
लागत और टैरिफ का जाल
एक और चुनौती भारत में बिजली की लागत संरचना है। एग्रीकल्चर सेक्टर को सपोर्ट करने के लिए, भारतीय राज्य अक्सर एक क्रॉस-सब्सिडी मॉडल का इस्तेमाल करते हैं, जहाँ किसानों के लिए कीमत कम करने के लिए इंडस्ट्रियल यूज़र्स से काफी ज़्यादा टैरिफ वसूला जाता है। एक सेमीकंडक्टर फैक्ट्री के लिए, बिजली सबसे बड़े लगातार खर्चों में से एक है। जब तक सरकार इन हाई-टेक ज़ोन्स के लिए स्पेशल टैरिफ स्ट्रक्चर या छूट नहीं देती, तब तक भारत में मैन्युफैक्चरिंग की लागत ताइवान, साउथ कोरिया या वियतनाम जैसे स्थापित हब्स की तुलना में महंगी हो सकती है, जहाँ बड़े इंडस्ट्रियल प्लेयर्स के लिए बिजली अक्सर स्थिर और कम दरों पर मिलती है।
बड़ा बिजनेस कॉन्टेक्स्ट
सेमीकंडक्टर प्रोडक्शन के लिए भारी मात्रा में अल्ट्रा-प्योर पानी की भी ज़रूरत होती है, जिसे एनर्जी-इंटेंसिव प्रोसेस के ज़रिए प्यूरीफाई करना पड़ता है। यह फैक्ट्री को 24/7 चलाने के लिए ज़रूरी बड़े बेसलाइन लोड के अलावा बिजली की मांग को और बढ़ा देता है। जहाँ भारत के पास बिजली उत्पादन की काफी क्षमता है, वहीं मुद्दा सिर्फ कुल सप्लाई का नहीं, बल्कि खास इंडस्ट्रियल कॉरिडोर तक साफ, निर्बाध और किफ़ायती बिजली पहुंचाने की क्षमता का है। ग्लोबल टेक दिग्गज, जिनकी ये फैक्ट्रियां सप्लाई करेंगी, ये भी डिमांड करते हैं कि उनकी सप्लाई चेन सख्त एनवायरनमेंटल स्टैंडर्ड्स का पालन करे, जिसका मतलब है कि इन नई फैक्ट्रियों को 24/7 अपटाइम की ज़रूरत से समझौता किए बिना रिन्यूएबल एनर्जी को इंटीग्रेट करने के तरीके खोजने होंगे। फिलहाल, बड़े पैमाने पर बैटरी स्टोरेज टेक्नोलॉजी की कमी की वजह से प्लांट को पूरी तरह से सोलर या विंड पावर पर चलाना एक बड़ी तकनीकी चुनौती है।
जोखिम और चिंताएं
निवेशकों को पता होना चाहिए कि यहाँ का मुख्य जोखिम एग्जीक्यूशन और प्रोजेक्ट की वायबिलिटी (viability) है। अगर सरकार रेगुलेटरी और टैरिफ की बाधाओं को दूर नहीं करती है, तो कंपनियों को कॉस्ट ओवररन का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, फॉसिल-फ्यूल-आधारित कैप्टिव पावर प्लांट्स पर निर्भरता इन कंपनियों के ESG (Environmental, Social, and Governance) लक्ष्यों को जटिल बना सकती है, जो ग्लोबल इंस्टीट्यूशनल निवेशकों को आकर्षित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। अगर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की टाइमलाइन के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता है, तो फुल प्रोडक्शन कैपेसिटी तक पहुँचने में देरी हो सकती है।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
आगे चलकर, निवेशक सेमीकंडक्टर हब्स के लिए डेडिकेटेड पावर कॉरिडोर के बारे में पॉलिसी घोषणाओं पर नज़र रख सकते हैं। टैरिफ छूट, इन खास ज़ोन्स के लिए इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन फीस का हटना, और लोकल पावर स्टोरेज के लिए सरकार द्वारा समर्थित पहलों के बारे में खबरें देखें। कंपनी के कैप्टिव पावर स्ट्रेटेजी और प्रोजेक्ट के इंटरनल रेट ऑफ रिटर्न (IRR) पर इसके प्रभाव के बारे में मैनेजमेंट की कमेंट्री अहम होगी। इसके अतिरिक्त, हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग के लिए विशेष पावर ज़ोन्स के संबंध में स्टेट रेगुलेटरी कमीशन से किसी भी अपडेट पर नज़र रखें, क्योंकि ये नई चिप फैक्ट्रियों की लॉन्ग-टर्म कॉस्ट कॉम्पिटिटिवनेस को सीधे प्रभावित करेंगी।
