रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची नकदी
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत में सर्कुलेट हो रही फिजिकल करेंसी में भारी उछाल आया है और यह ₹42.3 लाख करोड़ के अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। पिछले साल की तुलना में इसमें 11.8% की वृद्धि देखी गई है। यह लगातार छह महीनों से नकदी की उच्च मांग का संकेत है।
क्यों बढ़ रही है कैश की मांग?
अकेले अप्रैल के पहले हाफ में करेंसी सर्कुलेशन ₹61,000 करोड़ से ज्यादा बढ़ा, जिससे कुल आंकड़ा ₹42.3 लाख करोड़ हो गया। इकोनॉमिस्ट्स इस लगातार बढ़ती मांग के पीछे कई कारण गिना रहे हैं। ICICI Securities Primary Dealership के अभिषेक उपाध्याय बताते हैं कि GDP ग्रोथ के मुकाबले पीछे चल रही करेंसी की मांग में अब उछाल आना लाजिमी था, खासकर रूरल डिमांड के मजबूत होने से। सितंबर में रोजमर्रा की चीजों पर GST में कटौती से भी कंजम्पशन और कैश खर्च बढ़ा है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के सौम्या कांति घोष का मानना है कि कम ब्याज दरों के चलते लोग ज्यादा कैश रखना पसंद कर रहे हैं, खासकर ग्रामीण इलाकों में। गोल्ड और सिल्वर जैसी कीमती धातुओं की बढ़ती कीमतों से भी अप्रत्यक्ष रूप से कैश के इस्तेमाल को बढ़ावा मिल सकता है।
डिजिटल ग्रोथ के बावजूद कैश का दबदबा
भारत में डिजिटल पेमेंट्स, जैसे UPI ट्रांजैक्शन में जबरदस्त ग्रोथ के बावजूद, फिजिकल कैश का इस्तेमाल अभी भी काफी ज्यादा है। भारत का कैश-टू-GDP रेशियो, जो पेंडेमिक के चरम पर था, जनवरी 2026 तक करीब 11.2% रहने का अनुमान है। यह जापान, यूरो जोन, चीन और अमेरिका जैसे देशों से ज्यादा है। कैश के इस लगातार इस्तेमाल की एक बड़ी वजह है विशाल इनफॉर्मल इकोनॉमी, जहां कैश आसानी और तेजी से काम आता है। इस सेक्टर में बढ़ती मुश्किलों के चलते शायद ज्यादा से ज्यादा एक्टिविटी कैश-बेस्ड और कम पारदर्शी तरीकों की ओर शिफ्ट हो रही है। ऐतिहासिक रूप से, मार्च 2017 में ₹13.35 लाख करोड़ से बढ़कर मार्च 2024 तक करेंसी इन सर्कुलेशन (CIC) ₹35.15 लाख करोड़ से ज्यादा हो गई है। पेंडेमिक के दौरान यह रेशियो बढ़कर 14.4% (मार्च 2021) तक पहुंच गया था, लेकिन बाद में यह थोड़ा कम हुआ, जो दिखाता है कि डिजिटल ग्रोथ और कैश पर निर्भरता साथ-साथ चल सकती है। हालांकि महंगाई भी नकदी की मांग बढ़ाती है, पर अनुमान है कि यह वर्तमान वृद्धि का केवल 40% ही है, यानी इसके पीछे अन्य स्ट्रक्चरल वजहें भी हैं।
लिक्विडिटी पर चुनौती
करेंसी सर्कुलेशन में यह लगातार बढ़ोतरी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लिए एक चुनौती पेश कर रही है। RBI बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त लिक्विडिटी बनाए रखना चाहता है ताकि आर्थिक विकास को सपोर्ट मिल सके। HDFC Bank का अनुमान है कि फाइनेंशियल ईयर के पहले हाफ में लिक्विडिटी सरप्लस करीब 1% डिपॉजिट रहेगा, जो दूसरे हाफ में घटकर 0.5% हो सकता है। लेकिन, इकोनॉमिस्ट साक्षी गुप्ता चेतावनी देती हैं कि महंगाई या मजबूत रूरल खर्च से प्रेरित उच्च कैश मांग इन पूर्वानुमानों को नीचे ला सकती है। यह कैश की मांग बैंकिंग सिस्टम से लिक्विडिटी को 'ड्रेन' करती है, जिससे कर्ज देने के लिए फंड्स कम हो जाते हैं और RBI के नीतिगत फैसलों का अर्थव्यवस्था पर असर पड़ना जटिल हो जाता है। RBI शॉर्ट-टर्म ब्याज दरों को नियंत्रित करने के लिए डिपॉजिट का 0.6% से 1.1% लिक्विडिटी सरप्लस टारगेट करता है। सर्कुलेशन से लगातार होने वाली यह कटौती, केंद्रीय बैंक को और सीधे हस्तक्षेप करने पर मजबूर कर सकती है, जो बाजार की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।
आगे क्या?
आगे चलकर, इकोनॉमिस्ट्स को उम्मीद है कि कृषि उत्पादन और हालिया GST दरों में हुए बदलाव जैसे कारक रूरल डिमांड को सपोर्ट करते रहेंगे, जिससे कैश का इस्तेमाल बढ़ता रहेगा। IDFC First Bank की चीफ इकोनॉमिस्ट गौरा सेनगुप्ता, FY26 में 'करेंसी लीकेज' के ₹2.2 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाती हैं, जो FY25 में ₹2.09 लाख करोड़ से ज्यादा है। डिजिटल पेमेंट सिस्टम के विस्तार के बावजूद फिजिकल कैश की यह लगातार मांग, भारत के फाइनेंशियल लैंडस्केप में कैश के महत्वपूर्ण बने रहने का संकेत देती है, जिसके लिए सेंट्रल बैंक को अपनी लिक्विडिटी मैनेजमेंट योजनाओं में लगातार समायोजन करना होगा।
