स्ट्रक्चरल नुकसान का असर
विदेशी निवेशक अब भारत को निवेश के लिए कम आकर्षक मान रहे हैं। इसकी मुख्य वजह कैपिटल गेन्स टैक्स (Capital Gains Tax) में हालिया बढ़ोतरी और इन्फ्लेशन (Inflation) के हिसाब से एडजस्टमेंट (Indexation Benefits) के लाभ को हटाना है। इससे विदेशी निवेश पर टैक्स का बोझ बढ़ गया है। मार्केट एक्सपर्ट समीर अरोड़ा ने इसे भारत के निवेश इमेज के लिए 'बड़ी गलती' करार दिया है।
इसके अलावा, भारतीय रुपये में लगातार आ रही गिरावट भी एक बड़ी चुनौती है। पिछले एक दशक में रुपया औसतन 3.95% सालाना डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है, जिससे डॉलर में रिटर्न कम हो जाता है और विदेशी फंड्स को घर वापसी पर मुनाफा घट जाता है। इन टैक्स नीतियों और करेंसी की अस्थिरता ने विदेशी फंड्स के लिए निवेश करना मुश्किल बना दिया है।
ग्लोबल कॉम्पिटिशन और साथियों का हाल
भारत के नए टैक्स नियम इसे अपने एशियाई पड़ोसियों जैसे ताइवान (Taiwan) और दक्षिण कोरिया (South Korea) के मुकाबले कम प्रतिस्पर्धी बनाते हैं। खबरें हैं कि इन देशों में विदेशी निवेशकों के लिए इक्विटी (Equity) पर कोई कैपिटल गेन्स टैक्स नहीं है, जो उन्हें कहीं ज्यादा आकर्षक बनाता है। ये मार्केट इन दिनों फॉरेन इन्वेस्टमेंट खींच रहे हैं, जबकि भारत से 2 बिलियन डॉलर से ज्यादा का आउटफ्लो (Outflow) देखा गया है।
हालांकि, भारत की 12.5% लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) रेट अमेरिका, यूके या थाईलैंड जैसे देशों के मुकाबले प्रतिस्पर्धी है, लेकिन इंडेक्सेशन लाभ का खत्म होना और फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) के लिए 20% शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स (STCG) रेट का लागू होना इसकी अपील को कम कर रहा है। सिंगापुर (Singapore) और यूएई (UAE) जैसे देश, जहां कैपिटल गेन्स टैक्स शून्य है, प्रमुख डेस्टिनेशन बने हुए हैं। इन सब वजहों से फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने बड़ी बिकवाली की है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में FPIs ने भारतीय इक्विटी में करीब ₹1.76 ट्रिलियन की बिकवाली की, जो पिछले फाइनेंशियल ईयर 25 के ₹1.27 ट्रिलियन से ज्यादा है।
लगातार बनी हुई चुनौतियां
विदेशी निवेशकों की बिकवाली सिर्फ टैक्स बदलावों के कारण नहीं है। गिरता हुआ रुपया, प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में धीमी कॉर्पोरेट अर्निंग ग्रोथ (Corporate Earnings Growth) और अमेरिका में बढ़ते यील्ड्स (Yields) ने भी विदेशी पूंजी को बाहर जाने पर मजबूर किया है। इन आउटफ्लो से शेयर बाजार में वोलेटिलिटी (Volatility) बढ़ रही है और लिक्विडिटी कम हो रही है, जिससे ट्रेडिंग मुश्किल हो रही है।
रेगुलेटरी अनिश्चितता (Regulatory Uncertainty) भी एक चिंता का विषय है। अगस्त 2023 में आए नए डिस्क्लोजर (Disclosure) नियमों में मार्च 2024 में हुए बदलावों ने भी बिकवाली को हवा दी है। ऐसी पॉलिसी शिफ्ट विदेशी निवेशकों के लिए जोखिम बढ़ा सकती हैं।
आगे की राह
कुछ मार्केट स्ट्रेटेजिस्ट (Market Strategists) उम्मीद कर रहे हैं कि 2026 तक विदेशी निवेशकों के फ्लो में सुधार हो सकता है। एंटीक स्टॉक ब्रोकिंग लिमिटेड (Antique Stock Broking Limited) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में आउटफ्लो के कारणों में कमी आ रही है और अर्निंग्स, वैल्यूएशन (Valuation) व मार्केट स्टेबिलिटी (Market Stability) में सुधार की उम्मीद है। उन्होंने यह भी बताया कि 2025 में FPI इक्विटी आउटफ्लो 17.5 बिलियन USD के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था, लेकिन 2026 में ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स (Interest Rates) में संभावित गिरावट और भारत की नॉमिनल ग्रोथ (Nominal Growth) में तेजी आने से यह वापस आ सकता है।
इसके अलावा, ग्लोबल बॉन्ड इंडेक्स (Bond Index) में शामिल होने के कारण भारत के डेट मार्केट (Debt Market) में भी विदेशी मांग बने रहने की उम्मीद है। हालांकि, AI-केंद्रित इमर्जिंग मार्केट्स (Emerging Markets) को भारत पर तरजीह देना एक जोखिम बना रह सकता है।