India Capital Account: चिंताजनक संकेत! विदेशी निवेशकों का पैसा बाहर, वैल्यूएशन पर सवाल, रुपया दबाव में

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AuthorMehul Desai|Published at:
India Capital Account: चिंताजनक संकेत! विदेशी निवेशकों का पैसा बाहर, वैल्यूएशन पर सवाल, रुपया दबाव में
Overview

भारत का कैपिटल अकाउंट (Capital Account) भारी दबाव में है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का पैसा लगातार बाहर जा रहा है और नेट फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) में भी कमी देखी जा रही है। RBI के एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ECB) नियमों में ढील के बावजूद, रुपये पर दबाव बना हुआ है।

क्या है कैपिटल अकाउंट पर दबाव की वजह?

भारत का कैपिटल अकाउंट (Capital Account) आजकल दबाव में है, और इसकी वजहें साफ हैं। ऊंचे वैल्यूएशन, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का भारी बिकवाली (outflow) और दुनिया भर में पूंजी के नए आवंटन (capital reallocation) के कारण भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स (Emerging Markets) पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।

FDI और FPI में भारी कमी

पहले जहां भारत में नेट फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) का प्रवाह लगातार बना रहता था, वहीं अब तस्वीर बदल गई है। पिछले 5 फाइनेंशियल ईयर (FY) में, जो FY25 में समाप्त हुआ, ग्रास एफडीआई औसतन $78 बिलियन रहा। लेकिन, इक्विटी रिपेट्रिएशन (पैसा वापस ले जाना) में भारी बढ़ोतरी और भारतीय कंपनियों द्वारा विदेश में किए जा रहे निवेश में इजाफे ने नेट इनफ्लो को काफी कम कर दिया है। FY21 में जहां $27 बिलियन का रिपेट्रिएशन था, वह FY25 तक बढ़कर $51 बिलियन हो गया। वहीं, विदेशी निवेश $11 बिलियन से बढ़कर $27 बिलियन पहुंच गया। इसका नतीजा यह हुआ कि नेट एफडीआई $10 बिलियन से नीचे चला गया, और FY26 के शुरुआती 10 महीनों में तो यह मात्र $5.6 बिलियन ही रहा। फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) का हाल भी कुछ ऐसा ही है। FY25 में नेट इनफ्लो गिरकर $1.6 बिलियन रह गया और FY26 के पहले 10 महीनों में यह $7.5 बिलियन के नेगेटिव में चला गया। रुपया भी लगातार कमजोर हो रहा है और 90.87 के स्तर पर कारोबार कर रहा है, जो इन आउटफ्लो को और बढ़ाता है।

वैल्यूएशन गैप का असर

इस कैपिटल फ्लाइट (Capital Flight) की एक बड़ी वजह भारत के शेयर बाजार का वैल्यूएशन प्रीमियम (Valuation Premium) है। निफ्टी 50 का P/E रेशियो करीब 22.03 है, और सेंसेक्स 22.3 पर है। यह इमर्जिंग मार्केट्स के औसत P/E रेशियो 16.34 से काफी ज्यादा है। इसके मुकाबले, अमेरिका और यूरोप जैसे डेवलप्ड मार्केट्स (Developed Markets) अक्सर 15 से कम P/E रेशियो पर ट्रेड करते हैं, जो निवेशकों को बेहतर रिस्क-रिवॉर्ड प्रोफाइल दिखाते हैं। एफएमसीजी (FMCG), कंज्यूमर ड्यूरेबल्स (Consumer Durables), हेल्थकेयर (Healthcare) और रियलटी (Realty) जैसे सेक्टरों में 30-40 का P/E रेशियो, कोविड के बाद धीमी अर्निंग्स ग्रोथ को देखते हुए, सही नहीं लगता। इस वजह से, निवेशक पैसा निकालकर डेवलप्ड इकोनॉमीज की ओर जा रहे हैं, जहां उन्हें बेहतर रिटर्न की उम्मीद है।

RBI के ECB रिफॉर्म्स और ग्लोबल फैक्टर्स

इन कैपिटल फ्लो (Capital Flow) दबावों से निपटने के लिए, RBI ने 16 फरवरी, 2026 को एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ECB) नियमों में बड़ी ढील दी। नए नियमों में ऑल-इन-कॉस्ट सीलिंग (All-in-cost ceiling) हटाई गई, मैच्योरिटी नॉर्म्स (Maturity norms) को आसान बनाया गया, और उधार लेने की लिमिट को $1 बिलियन या नेट वर्थ के 300% (जो भी ज्यादा हो) तक बढ़ाया गया। इसका मकसद विदेशी कर्ज को सस्ता और सुलभ बनाना है। हालांकि, वैश्विक आर्थिक हालात इन उपायों की प्रभावशीलता को चुनौती दे रहे हैं। अमेरिका में लगातार ब्याज दरों में बढ़ोतरी (Interest Rate Hikes) पूंजी को डेवलप्ड मार्केट्स की ओर खींच रही है, जबकि जियोपॉलिटिकल रिस्क (Geopolitical Risks) अनिश्चितता बढ़ा रहे हैं, जिससे भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स कम आकर्षक हो रहे हैं।

निराशावादी नजरिया (Bear Case)

भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत ग्रोथ की कहानी, कैपिटल अकाउंट की कमजोरियों से मेल नहीं खा रही है। मुख्य जोखिम भारत के लगातार ऊंचे मार्केट वैल्यूएशन में है, जो इमर्जिंग मार्केट्स और कुछ डेवलप्ड मार्केट्स से भी ज्यादा है। 2025 में $18 बिलियन के रिकॉर्ड FPI इक्विटी आउटफ्लो को देखते हुए, यह एक बड़ी समस्या है। नेट एफडीआई भी काफी कम हो गया है, क्योंकि रिपेट्रिएशन और भारतीय कंपनियों के विदेश में निवेश में बढ़ोतरी हुई है। जियोपॉलिटिकल टेंशन, सप्लाई चेन की दिक्कतें और अमेरिकी टैरिफ की अनिश्चितता भी निवेशकों की भावना पर भारी पड़ रही हैं। 2026 में 1.4-1.5% तक पहुंचने का अनुमानित करेंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) भी बाहरी संतुलन को और जटिल बना रहा है।

भविष्य का अनुमान

आने वाले समय में, 2026 तक भारतीय रुपये में उतार-चढ़ाव जारी रहने की उम्मीद है, और यह 91-92 के स्तर को फिर से छू सकता है। MUFG जैसी संस्थाओं का अनुमान है कि इंपोर्ट की जरूरतें, कमजोर नेट एफडीआई और धीमी फिस्कल कंसॉलिडेशन के कारण रुपया अंडरपरफॉर्म करेगा। विदेशी निवेशक तभी लौटेंगे जब वैल्यूएशन कम होंगे, कॉर्पोरेट अर्निंग्स स्थिर होंगी, अमेरिका जैसे देशों से ट्रेड डील में प्रगति होगी और वैश्विक ब्याज दरें, खासकर यूएस फेडरल रिजर्व की ओर से, कम होंगी। आईटी सेक्टर (IT Sector) भले ही एक उज्ज्वल पक्ष है, जो ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) को कुछ हद तक संतुलित कर सकता है, लेकिन कुल मिलाकर कैपिटल अकाउंट वैश्विक आर्थिक बदलावों और भू-राजनीतिक घटनाओं के प्रति संवेदनशील बना रहेगा।

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