कॉर्पोरेट इंडिया: CEO बनीं सिर्फ 5% महिलाएं, 63% प्रमोटर परिवार से, वेतन में बड़ी खाई

ECONOMY
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
कॉर्पोरेट इंडिया: CEO बनीं सिर्फ 5% महिलाएं, 63% प्रमोटर परिवार से, वेतन में बड़ी खाई
Overview

भारत की बड़ी लिस्टेड कंपनियों में महिला लीडरशिप (Women Leadership) की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, केवल **5%** कंपनियां ही ऐसी हैं जहाँ CEO या MD के पद पर महिलाएं काबिज हैं, और इनमें से **63%** लीडर्स प्रमोटर परिवारों से आती हैं। इसके साथ ही, पुरुषों और महिलाओं के वेतन (Salary) में भी बड़ा अंतर देखा गया है।

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### लीडरशिप में महिलाओं की धीमी रफ्तार, 'ग्लास सीलिंग' बरकरार

भारत की टॉप कॉर्पोरेट लीडरशिप में महिलाओं की तरक्की की रफ्तार थम सी गई है। रेगुलेटरी नियमों और बोर्ड में महिलाओं की बढ़ती मौजूदगी के बावजूद, देश की 2,285 लिस्टेड कंपनियों में मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) या चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (CEO) के पद पर महिलाओं की संख्या पिछले 5 सालों से 5% के आसपास ही अटकी हुई है। यह आंकड़ा बताता है कि बोर्डरूम में भले ही जेंडर बैलेंस दिख रहा हो, लेकिन एग्जीक्यूटिव पावर तक महिलाओं की पहुंच नहीं बन पा रही है। एक्सपर्ट्स इसे 'लीकी पाइपलाइन' (Leaky Pipeline) कहते हैं, जहाँ टॉप टैलेंट होने के बावजूद महिलाएं कॉर्पोरेट जगत के सबसे ऊंचे पदों तक नहीं पहुँच पातीं।

### प्रमोटर परिवारों का दबदबा और ग्लोबल गैप

एक खास बात यह है कि जो कुछ महिलाएं CEO/MD के पद तक पहुँच पाई हैं, उनमें से लगभग 63% प्रमोटर (Promoter) या फाउंडर परिवारों से हैं। यह पारिवारिक जुड़ाव उन प्रोफेशनल महिला लीडर्स के लिए अवसरों को सीमित करता है जिन्होंने मेहनत और काबिलियत के दम पर तरक्की की है। यह भारतीय कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर में एक बड़ी बाधा को दर्शाता है। ग्लोबल ट्रेंड्स के मुकाबले, जहाँ महिलाओं की टॉप लीडरशिप में हिस्सेदारी भारत से बेहतर है, भारत की स्थिति कमजोर है। जेंडर गैप रिपोर्ट 2025 में भारत 148 देशों में से 131वें स्थान पर रहा। रेगुलेटरी संस्थाओं ने बोर्ड में कम से कम एक महिला डायरेक्टर को अनिवार्य कर दिया है, लेकिन इसका असर एग्जीक्यूटिव लीडरशिप पर न के बराबर दिख रहा है।

### वेतन का बड़ा अंतर: मौके और कमाई में खाई

ऊँचे पदों पर महिलाओं की कम संख्या का सीधा असर उनकी कमाई पर भी दिखता है। फाइनेंशियल ईयर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, पुरुष एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर्स (Executive Directors) की औसत सैलरी ₹120 लाख रही, जो महिला एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर्स की औसत सैलरी ₹69 लाख से लगभग 74% ज्यादा है। यह अंतर नॉन-प्रमोटर एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर्स के मामले में और भी बड़ा है, जहाँ पुरुष एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर्स की औसत सैलरी ₹104 लाख थी, जबकि महिलाओं की ₹43 लाख। हालांकि, इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स (Independent Directors) के मामले में यह ट्रेंड उल्टा है, जहाँ महिला डायरेक्टर्स की औसत कमाई ₹4.90 लाख पुरुषों के ₹4.80 लाख से थोड़ी ज्यादा है। लेकिन कुल मिलाकर, एग्जीक्यूटिव लेवल पर जेंडर पे गैप (Gender Pay Gap) साफ नजर आता है।

### स्ट्रक्चरल कमजोरियां और छूटे हुए मौके

CEO पदों पर प्रमोटर परिवारों का लगातार दबदबा निर्णय लेने की प्रक्रिया और कॉर्पोरेट गवर्नेंस (Corporate Governance) को लेकर चिंताएं बढ़ाता है। ऐसे नेतृत्व पूल जो बाहरी प्रोफेशनल टैलेंट की बजाय पारिवारिक संबंधों पर निर्भर करता है, वह संकीर्ण सोच को बढ़ावा दे सकता है और ग्लोबल मार्केट्स में जरूरी विविध रणनीतिक दृष्टिकोणों को नजरअंदाज कर सकता है। 'लीकी पाइपलाइन' की समस्या सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह उन संगठनात्मक कल्चर और नीतियों का संकेत है जो करियर के मध्य में महिला प्रतिभाओं को बनाए रखने और उन्हें आगे बढ़ने से रोकती हैं। रिसर्च बताती है कि जेंडर डाइवर्सिटी (Gender Diversity), खासकर बोर्ड और सीनियर मैनेजमेंट लेवल पर, कंपनी के फाइनेंशियल परफॉरमेंस, इनोवेशन और कर्मचारी संतुष्टि के लिए फायदेमंद है। भारत का महिला एग्जीक्यूटिव लीडरशिप बेस बनाने में पीछे रहना उसकी आर्थिक क्षमता पर एक बड़ी बाधा है।

### भविष्य की राह: नीतियों और सोच में बदलाव जरूरी

एक्सपर्ट्स का मानना है कि सिर्फ रेगुलेटरी नियमों का पालन करना काफी नहीं है। आगे बढ़ने के लिए ऐसी नीतियों की जरूरत है जो सपोर्टिव वर्कप्लेस प्रैक्टिसेस, करियर के मध्य में आने वाली बाधाओं को दूर करने और प्रमोशन में पूर्वाग्रहों (Bias) को खत्म करने पर केंद्रित हों। एनालिस्ट्स का कहना है कि कंपनियां ESG (Environmental, Social, and Governance) लक्ष्यों से डाइवर्सिटी मैट्रिक्स को जोड़ रही हैं, जो जवाबदेही की ओर एक संभावित बदलाव का संकेत है। हालांकि, प्रगति धीमी हुई है, और पिछले सालों की तुलना में कम कंपनियाँ महिला लीडर्स की संख्या में वृद्धि की रिपोर्ट कर रही हैं। असली प्रगति के लिए एक सांस्कृतिक बदलाव की आवश्यकता है जो सक्रिय रूप से महिला एग्जीक्यूटिव भूमिकाओं के लिए उन्हें तैयार करे और बढ़ावा दे, ताकि केवल दिखावटी प्रतिनिधित्व से हटकर असली समावेश (Inclusion) हो सके।

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