भारत का Current Account Deficit बढ़ा: बढ़ते आयात से घाटे का बोझ, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव!

ECONOMY
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AuthorKaran Malhotra|Published at:
भारत का Current Account Deficit बढ़ा: बढ़ते आयात से घाटे का बोझ, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव!
Overview

भारत का Current Account Deficit (CAD) साल-दर-साल बढ़कर **13.2 अरब डॉलर** (GDP का **1.3%**) पर पहुंच गया है। यह मुख्य रूप से मर्चेंडाइज (सामान) के व्यापार में बढ़ते घाटे के कारण हुआ है, जिसने देश के सर्विस एक्सपोर्ट्स की मजबूती को भी परखा है।

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बाहरी सेक्टर पर बढ़ा दबाव!

भारत के बाहरी वित्तीय समीकरणों पर दबाव के संकेत साफ दिख रहे हैं, क्योंकि चालू खाते का घाटा (Current Account Deficit - CAD) वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही (Q3 FY26) में बढ़ गया है। यह मुख्य रूप से मर्चेंडाइज (सामान) के आयात में हुई बड़ी बढ़ोतरी के कारण हुआ है, जिसने देश के सर्विस एक्सपोर्ट्स की मजबूती को भी चुनौती दी है। इस स्थिति का सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) पर भी पड़ रहा है।

सोने-चांदी के आयात से बढ़ा सामान का घाटा

दिसंबर तिमाही (Q3 FY26) में भारत का मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट (सामान के आयात-निर्यात का घाटा) काफी बढ़ गया। यह पिछले साल की इसी अवधि के 79.3 अरब डॉलर से बढ़कर 93.6 अरब डॉलर हो गया। इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह आयात में जबरदस्त उछाल है। खासकर, जनवरी 2026 में सोने के आयात में 349.22% और चांदी के आयात में 127.00% की भारी बढ़ोतरी देखी गई। इसके अलावा, नॉन-फेरस मेटल जैसे औद्योगिक कच्चे माल की मांग भी मजबूत रही। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के अप्रैल-जनवरी के दौरान मर्चेंडाइज इम्पोर्ट में 7.21% की सालाना बढ़ोतरी हुई, जिससे इस अवधि का कुल मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट 248.32 अरब डॉलर पर पहुंच गया। यह बढ़ती मांग घरेलू खपत और औद्योगिक गतिविधियों को दर्शाती है, लेकिन व्यापार संतुलन पर भारी पड़ रही है।

सर्विस सेक्टर दे रहा सहारा, पर चुनौतियां बरकरार

अच्छी बात यह है कि देश का सर्विस सेक्टर (सेवा क्षेत्र) अभी भी मजबूती दिखा रहा है। दिसंबर तिमाही में नेट सर्विस रिसिप्ट्स (सेवाओं से प्राप्त आय) बढ़कर 57.5 अरब डॉलर हो गई, जो पिछले साल की इसी तिमाही में 51.2 अरब डॉलर थी। सर्विस एक्सपोर्ट्स, जो भारत की अर्थव्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ हैं, में लगातार अच्छी ग्रोथ देखने को मिली है। यह सेक्टर देश के ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) का 50% से ज्यादा योगदान देता है। इसके बावजूद, सामान के व्यापार में घाटा जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, उसे देखते हुए सर्विस एक्सपोर्ट्स के लिए इस बढ़ते बाहरी असंतुलन को पूरी तरह से संभालना एक चुनौती साबित हो रहा है। अप्रैल-जनवरी FY26 के लिए कुल सर्विस ट्रेड सरप्लस 180.58 अरब डॉलर रहा, जो कि मर्चेंडाइज डेफिसिट ( 248.32 अरब डॉलर ) से काफी कम है।

FDI में गिरावट और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी

विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) के मोर्चे पर भी चिंताएं बढ़ी हैं। दिसंबर तिमाही में 3.7 अरब डॉलर का नेट आउटफ्लो (पैसे का बाहर जाना) देखा गया, जो पिछले साल इसी अवधि में 2.8 अरब डॉलर था। दिसंबर 2025 में लगातार चौथे महीने नेट FDI निगेटिव रहा, जो -1.61 अरब डॉलर दर्ज किया गया। इसका मुख्य कारण भारतीय कंपनियों द्वारा ज्यादा प्रॉफिट वापस भेजना और बाहर निवेश करना था, जो नए निवेश से ज्यादा था। इन सब वजहों से, दिसंबर तिमाही में देश के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) में 24.4 अरब डॉलर की शुद्ध कमी आई। हालांकि, मार्च 2026 तक रिजर्व 745 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान था और फरवरी 2026 के मध्य तक यह 725.727 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर भी पहुंचा था। लेकिन 20 फरवरी 2026 तक के साप्ताहिक आंकड़े बताते हैं कि यह घटकर 723.60 अरब डॉलर पर आ गया था, जो बाजार में जारी दबाव और RBI के हस्तक्षेप का संकेत है।

करेंसी पर दबाव और संरचनात्मक जोखिम

इस बढ़ते मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट से भारत की कुछ संरचनात्मक कमजोरियां भी उजागर होती हैं। ऐसा लगता है कि खास तौर पर सोने और औद्योगिक सामानों के आयात की मांग, निर्यात वृद्धि से कहीं ज्यादा तेज हो गई है। मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट्स में ग्रोथ धीमी रही है, खासकर पारंपरिक बाजारों में मांग कमजोर बनी हुई है। साथ ही, भारत तेल जैसे अहम कमोडिटीज के आयात पर काफी निर्भर है, जिससे ग्लोबल कीमतों में उतार-चढ़ाव का जोखिम बना रहता है।

रुपये पर भी पड़ सकता है असर

करेंसी के मोर्चे पर भी चुनौतियां दिख रही हैं। भू-राजनीतिक तनाव के बीच डॉलर की बढ़ती मांग के चलते 2 मार्च 2026 को भारतीय रुपया ₹91 प्रति डॉलर के स्तर से नीचे गिर गया था। हालांकि, एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि 2026 में रुपया डॉलर के मुकाबले 88-91.50 के बीच स्थिर रह सकता है या थोड़ा मजबूत हो सकता है, जो ट्रेड डील्स की प्रगति और कैपिटल फ्लो जैसे कारकों पर निर्भर करेगा। लेकिन यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इतिहास गवाह है कि बढ़ता हुआ चालू खाता घाटा अक्सर रुपये पर दबाव डालता है।

आगे की राह: ग्रोथ अच्छी, पर बाहरी चुनौतियां?

आगे चलकर, इकोनॉमिस्ट्स भारत की आर्थिक ग्रोथ को मजबूत बनाए रखने की उम्मीद कर रहे हैं। IMF ने FY26 के लिए 7.3% और FY27 के लिए 6.4% GDP ग्रोथ का अनुमान लगाया है। सर्विस सेक्टर का विस्तार जारी रहने की उम्मीद है, जो अर्थव्यवस्था को सहारा देगा। लेकिन, लगातार बनी रहने वाली आयात की मांग, ग्लोबल कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव और आउटफ्लो को संतुलित करने के लिए FDI की जरूरत जैसे कारक CAD के भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) लगातार स्थिति पर नजर रखे हुए है और करेंसी की अस्थिरता को काबू में रखने के लिए अपने बड़े फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व का इस्तेमाल कर रहा है, हालांकि बाजार में जारी दबाव अभी भी चिंता का विषय बना हुआ है।

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