इकोनॉमी को बूस्ट देने के लिए सरकार का बड़ा दांव
2026-27 के Union Budget में सरकार ने ग्रोथ को सबसे ऊपर रखा है, खासकर भारी-भरकम कैपिटल एक्सपेंडिचर (कैपेक्स) के जरिए। इकोनॉमी में 6.8% से 7.2% की रियल जीडीपी ग्रोथ का लक्ष्य रखा गया है, जबकि नॉमिनल जीडीपी 10% रहने का अनुमान है। इस साल का फिस्कल डेफिसिट पिछले साल के 4.4% के अनुमान से घटकर 4.3% पर लाने का टारगेट है। ये नंबर्स दिखाते हैं कि सरकार मैक्रोइकॉनॉमिक स्टेबिलिटी बनाए रखते हुए खर्च बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
इंफ्रास्ट्रक्चर बनेगा ग्रोथ का इंजन
बजट की सबसे बड़ी खासियत है इंफ्रास्ट्रक्चर पर जबरदस्त फोकस। कैपिटल एक्सपेंडिचर के लिए करीब ₹12.2 लाख करोड़ का भारी-भरकम आवंटन किया गया है, जो पिछले फाइनेंशियल ईयर (FY26) के रिवाइज्ड अनुमानों से 11.5% ज्यादा है। यह आउटले अनुमानित जीडीपी का 3.1% है और इसे इकोनॉमिक एक्सपेंशन और प्रोडक्टिविटी बढ़ाने का मुख्य जरिया माना जा रहा है। नेशनल हाईवे डेवलपमेंट में तेजी जारी है, वहीं सिविल एविएशन सेक्टर में भी एयरपोर्ट कैपेसिटी बढ़ाने पर जोर है। इंफ्रास्ट्रक्चर में यह बड़ा इन्वेस्टमेंट लॉजिस्टिक्स कॉस्ट कम करेगा, कनेक्टिविटी बढ़ाएगा और इकोनॉमिक एक्टिविटी को और तेज करेगा।
ग्लोबल इकोनॉमी से बेहतर परफॉर्मेंस
भारत की 6.8%-7.2% की अनुमानित जीडीपी ग्रोथ, ग्लोबल इकोनॉमी के धीमेपन (लगभग 2.7%-3.3%) के मुकाबले काफी अच्छी मानी जा रही है। अप्रैल-दिसंबर 2025 के दौरान महंगाई (Inflation) भी कंट्रोल में रही, जो करीब 1.7% के आसपास थी, हालांकि हाल के आंकड़ों में थोड़ी बढ़ोतरी दिखी है।
ग्लोबल चुनौतियां और डोमेस्टिक स्ट्रेंथ
इन सबके बीच, ग्लोबल लेवल पर कई चुनौतियां बनी हुई हैं। जियोपॉलिटिकल टेंशन, ट्रेड पॉलिसी में अनिश्चितताएं और कमोडिटी के दामों में उतार-चढ़ाव इकोनॉमी के लिए सिरदर्द बन सकते हैं। भारतीय रुपये का कमजोर होना भी एक बाहरी फैक्टर है। इन चुनौतियों के बावजूद, बजट डोमेस्टिक डिमांड की मजबूती और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बूस्ट देने पर जोर दे रहा है, ताकि बाहरी झटकों से इकोनॉमी को बचाया जा सके।
एग्जीक्यूशन और डेट का रिस्क
बजट के बड़े लक्ष्यों को हासिल करने में एग्जीक्यूशन (Implementation) एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। 55.6% का अनुमानित डेट-टू-जीडीपी रेशियो अभी भी काफी ऊंचा है, जिसे FY31 तक 50±1% तक लाने का लक्ष्य है। डेट पर ब्याज चुकाने का भारी बोझ फिस्कल फ्लेक्सिबिलिटी को कम कर सकता है। बड़े इंफ्रा प्रोजेक्ट्स की सफलता सेंट्रल और स्टेट अथॉरिटीज के बीच स्मूथ कोऑर्डिनेशन पर निर्भर करेगी, जो अक्सर एक बड़ी चुनौती रही है। इसके अलावा, अगर कोर इन्फ्लेशन (खासकर नॉन-फूड और नॉन-फ्यूल आइटम्स में) बढ़ता रहा तो महंगाई फिर से जोर पकड़ सकती है। रेवेन्यू टारगेट, खासकर इनडायरेक्ट टैक्स से उम्मीद से कम ग्रोथ, पर भी पैनी नजर रखनी होगी।
आगे का रास्ता: उम्मीदें और खतरे
2026-27 का बजट भारत के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्यों का रोडमैप है। एनालिस्ट्स का मानना है कि डोमेस्टिक डिमांड की मजबूती के दम पर ग्रोथ जारी रहेगी। हालांकि, इस प्लान की असली परीक्षा सरकार की खर्चों को ठोस डेवलपमेंट आउटकम में बदलने की क्षमता और ग्लोबल इकोनॉमी की अनिश्चितताओं से निपटने की काबिलियत पर ही टिकी होगी।