ग्लोबल इकोनॉमी में बढ़ते बिखराव (fragmentation) के बीच, भारत सरकार ने यूनियन बजट 2026 में मैन्युफैक्चरिंग को अपनी लॉन्ग-टर्म आर्थिक रणनीति का मुख्य हिस्सा बनाया है। यह कदम सिर्फ विकास के लिए नहीं, बल्कि देश की Resilience बढ़ाने, मुद्रा (Currency) को मजबूती देने और Capital Cost को कम करने के लिए एक अहम हथियार के तौर पर देखा जा रहा है। चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा कि यह रणनीति ऐसे ग्लोबल मार्केट की हकीकत का जवाब है, जहाँ अगले कई सालों तक अनिश्चितता बनी रह सकती है।
औद्योगिक आत्मनिर्भरता के मुख्य स्तंभ
इस रणनीति के तहत, बजट मैन्युफैक्चरिंग में आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। खासकर रेयर अर्थ्स (rare earths) के खनन, प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक खास गलियारा (corridor) बनाने की योजना है। इसके अलावा, कंस्ट्रक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर इक्विपमेंट, केमिकल्स और बायोफार्मा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा। इन पहलों का मकसद आयात पर निर्भरता कम करना और भारत के औद्योगिक ढांचे को मजबूत करना है, ताकि बाहरी झटकों से बेहतर तरीके से निपटा जा सके। इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 के मुताबिक, हाई-टेक एक्टिविटीज अब मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू एडिशन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई हैं, जो अधिक उन्नत उत्पादन की ओर इशारा करता है।
इनपुट कॉस्ट घटाना और कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ाना
मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने का एक अहम हिस्सा है इंडस्ट्रीज के लिए इनपुट कॉस्ट (input cost) को लगातार कम करना। बजट में सिर्फ तात्कालिक उपायों पर ही नहीं, बल्कि स्ट्रक्चरल सुधारों पर भी ध्यान दिया गया है। पहले इकोनॉमिक सर्वे ने इंडस्ट्री की लागत बढ़ने में क्रॉस-सब्सिडी (cross-subsidisation) की भूमिका पर चिंता जताई थी, जिसे अब प्रस्तावित इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट बिल जैसे उपायों से दूर करने की कोशिश की जा रही है, ताकि ऐसी प्रथाओं को धीरे-धीरे खत्म किया जा सके। बजट में कस्टम ड्यूटी (customs duty) में कटौती और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे कंपोनेंट्स पर छूट भी इसी रणनीति का हिस्सा है। इससे लेबर-इंटेंसिव और हाई-टेक दोनों तरह के मैन्युफैक्चरिंग सेगमेंट्स को फायदा होगा। इसके अलावा, इंडिया-ईयू फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (India-EU Free Trade Agreement) केमिकल्स, मशीनरी और फार्मा जैसे प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में टैरिफ कम करने में मदद करेगा, जिससे भारतीय कंपनियां यूरोपीय वैल्यू चेन्स का हिस्सा बनेंगी और उनकी कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ेगी।
मैन्युफैक्चरिंग का मैक्रोइकोनॉमिक महत्व: करेंसी और कैपिटल
सीधे औद्योगिक समर्थन के अलावा, नागेश्वरन ने मैक्रोइकोनॉमिक स्टेबिलिटी (macroeconomic stability) में मैन्युफैक्चरिंग की अहम भूमिका पर भी जोर दिया। उनका तर्क है कि रुपये की मीडियम-टर्म वैल्यू को मजबूत करना सीधे तौर पर मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट बढ़ाने से जुड़ा है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह देखा गया है कि जिन देशों में मैन्युफैक्चरिंग की क्षमता मजबूत होती है, उनकी करेंसी भी अधिक स्थिर और मजबूत होती है, जबकि औद्योगिक आधार खोने वाले देशों की करेंसी में गिरावट आती है। इतना ही नहीं, देश के भीतर मजबूत मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करना Capital Cost को प्रभावी ढंग से कम करने का सबसे बेहतर तरीका है। इस लॉन्ग-टर्म प्रक्रिया के लिए सरकार और प्राइवेट सेक्टर दोनों के निरंतर प्रयासों की आवश्यकता होगी, खासकर जब ग्लोबल इकोनॉमिक कंडीशंस उतनी अनुकूल न हों। अनुमानों के मुताबिक, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर 7% की मजबूत ग्रोथ के लिए तैयार है, जो FY26 में देखी जा सकती है।
बिखरी हुई दुनिया में स्ट्रेटेजिक आउटलुक
बिखरी हुई दुनिया में, मौजूदा बजट का मैन्युफैक्चरिंग पर जोर 'स्ट्रेटेजिक रेसिलिएंस' (strategic resilience) बनाने की एक सोची-समझी रणनीति को दर्शाता है—यानी, ऐसी क्षमता विकसित करना कि वैश्विक सप्लाई चेन बाधित होने पर भी देश सुचारू रूप से काम कर सके। यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्लोबल ट्रेड पैटर्न लगातार भू-राजनीतिक (geopolitical) विचारों से बदल रहे हैं, और ये पूरी तरह से एफिशिएंसी पर आधारित मॉडल से हटकर Resilience और डाइवर्सिफिकेशन की ओर बढ़ रहे हैं। इस नीति का लक्ष्य एक भरोसेमंद मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर भारत की स्थिति को सुरक्षित करना है, जो ग्लोबल वैल्यू चेन्स में योगदान कर सके और साथ ही घरेलू आत्मनिर्भरता सुनिश्चित कर सके। इस लॉन्ग-टर्म विजन के लिए बाहरी अस्थिरताओं से निपटने और भारत के आर्थिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए निरंतर प्रयास और सहयोग की आवश्यकता है।