राजकोषीय अनुशासन और ग्रोथ का संगम
सरकार ने अपने बजट में ₹12.2 लाख करोड़ के लगातार कैपिटल एक्सपेंडिचर को बनाए रखने और राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को GDP के 4.3% पर सीमित रखने का लक्ष्य रखा है। यह कदम अर्थव्यवस्था में लंबी अवधि की स्थिरता और निवेशकों का भरोसा बढ़ाने का संकेत देता है। इस रणनीति का मकसद सिर्फ सरकारी खजाने को संभालना नहीं, बल्कि प्रमुख सेक्टरों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना और घरेलू व विदेशी निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनाना है।
MSMEs बनेंगे ग्रोथ के इंजन, आएगी नई जान
इस बजट में कैपिटल एक्सपेंडिचर सिर्फ बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। सरकार ने माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) को बढ़ावा देने पर भी खास जोर दिया है। इसके लिए ₹10,000 करोड़ का SME ग्रोथ फंड (SME Growth Fund) बनाया जाएगा। इसका मकसद MSMEs को बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों की तरह आकर्षक निवेश विकल्प बनाना है, जिससे भारत आत्मनिर्भर बने और अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF) का इकोसिस्टम मजबूत हो। साथ ही, भारत से बाहर रहने वाले व्यक्तियों (PROIs) के लिए नियमों को आसान बनाने और फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (FEMA) में ढील देने से कैपिटल मार्केट्स खुलेंगी, विदेशी निवेश बढ़ेगा और करेंसी व मार्केट में स्थिरता आएगी।
सेक्टर-स्पेशफिक डेवलपमेंट पर जोर
बायोफार्मा सेक्टर को बूस्ट देने के लिए ₹10,000 करोड़ के 'बायोफार्मा शक्ति' (Biopharma Shakti) प्रोग्राम की घोषणा की गई है। इससे देश में दवा निर्माण बढ़ेगा, रेगुलेटरी स्टैंडर्ड्स सुधरेंगे और भारत इस क्षेत्र में ग्लोबल लीडर बनेगा। क्लीन एनर्जी की ओर बढ़ते हुए, सरकार ने सोलर से जुड़े सामानों पर कस्टम ड्यूटी में छूट दी है और कार्बन कैप्चर टेक्नोलॉजी पर फोकस किया है। हेल्थ सेक्टर में कम्युनिटी वेल-बीइंग और इमरजेंसी केयर पर जोर दिया गया है। हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर के विस्तार, खासकर दक्षिण भारत को जोड़ने वाली लाइनों पर, कनेक्टिविटी बढ़ेगी। मुंबई और पुणे जैसे इलाकों में रियल एस्टेट, लॉजिस्टिक्स और रेजिडेंशियल सेक्टर को भी इससे फायदा होगा।
निवेशकों के लिए आसान होंगे नियम
सरकार निवेश के माहौल को और बेहतर बनाने के लिए कई कदम उठा रही है। टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स (TDS) के नियमों को सरल बनाया जाएगा, विदेशी संपत्ति की रिपोर्टिंग को आसान किया जाएगा और कंप्लायंस बढ़ाने के लिए एक वन-टाइम डिस्क्लोजर स्कीम (One-time Disclosure Scheme) लाई जाएगी। आईटी/आईटीईएस सेक्टर के लिए, एडवांस प्राइसिंग एग्रीमेंट्स (APAs) को तेजी से निपटाया जाएगा ताकि फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) को लेकर अनिश्चितता कम हो। टूरिज्म को भी इकोनॉमिक इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा दिया गया है, जिससे भारत एक ग्लोबल डेस्टिनेशन के तौर पर उभरेगा और GDP ग्रोथ व रोजगार को बढ़ावा मिलेगा।
लंबी अवधि के निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा
लगातार कैपिटल एक्सपेंडिचर और 4.3% राजकोषीय घाटे का लक्ष्य लंबी अवधि के निवेशकों के लिए भरोसे की नींव रखता है। जानकारों का मानना है कि वित्तीय विवेक (Fiscal Prudence) और सेक्टोरल सपोर्ट से स्पेकुलेटिव फ्लो की बजाय स्थिर, लॉन्ग-टर्म कैपिटल आकर्षित होता है। कॉर्पोरेट बॉन्ड और म्युनिसिपल फाइनेंसिंग में लिक्विडिटी बढ़ाने पर जोर देकर घरेलू कैपिटल मार्केट्स को गहरा किया जाएगा, जिससे निवेश के नए रास्ते खुलेंगे। सरकार का भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य इन नीतियों से और मजबूत होता है। ऐतिहासिक रूप से, ऐसे बजटों ने भारतीय शेयर बाजारों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दिखाई है, खासकर जब राजकोषीय अनुशासन और ग्रोथ-ओरिएंटेड खर्च साथ-साथ चले हों। वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद, मजबूत डोमेस्टिक डिमांड और सरकारी कैपिटल एक्सपेंडिचर के दम पर वित्तीय वर्ष 2026 में भारत की इकोनॉमी 7-7.5% की दर से बढ़ने का अनुमान है।