मॉनेटरी ट्रांसमिशन की नाकामयाबी?
आमतौर पर, मॉनेटरी पॉलिसी का पहला नियम यही कहता है कि जब सेंट्रल बैंक रेपो रेट घटाता है, तो अर्थव्यवस्था में पैसे की लागत कम हो जाती है, जिसकी शुरुआत रिस्क-फ्री रेट से होती है। लेकिन, मौजूदा हालात कुछ अलग कहानी बयां कर रहे हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) लगातार ब्याज दरें कम कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकारी बॉन्ड यील्ड (G-sec Yield Curve) उल्टी दिशा में जा रही है। यह दिखाता है कि मार्केट पार्टिसिपेंट्स शायद लंबी अवधि के सरकारी जोखिमों (Fiscal Risks) या लिक्विडिटी प्रीमियम को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं, जिन्हें RBI की छोटी अवधि की दर कटौतियां बेअसर नहीं कर पा रही हैं।
सरकारी खजाने पर बढ़ता ब्याज का बोझ
सरकार खुद देश के डेट मार्केट में सबसे बड़ा खिलाड़ी है। ऐसे में, लगातार ऊंचे यील्ड का बने रहना सीधे तौर पर राष्ट्रीय खजाने को नुकसान पहुंचा रहा है। जब कुल सरकारी खर्च का लगभग 26% सिर्फ ब्याज चुकाने में चला जाता है, तो यील्ड कर्व में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी का मतलब है कि सरकार को या तो ज्यादा कमाई करनी होगी या फिर फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटा) बढ़ाना पड़ेगा। सरकारें भारी मात्रा में बाजार से कर्ज ले रही हैं - अनुमान है कि केंद्र और राज्य मिलकर करीब ₹26 लाख करोड़ का उधार लेंगे। ऐसे में, उधार लेने की लागत में मामूली सी भी बढ़ोतरी का मतलब है अरबों रुपये का अतिरिक्त ब्याज भुगतान। यह सीधे तौर पर विकास और सामाजिक कल्याण के लिए रखे गए फंड को बॉन्डधारकों को भुगतान करने के लिए मजबूर करता है।
यील्ड क्यों बनी हुई है ऊंची?
यह ट्रांसमिशन फेलियर सिर्फ एक तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि लंबी अवधि के फिस्कल कंसॉलिडेशन को लेकर संस्थागत संदेह को भी दर्शाता है। कई कारण हैं जिनकी वजह से यील्ड ऊंचे बने हुए हैं। पहला, बॉन्ड मार्केट में सप्लाई-डिमांड का भारी असंतुलन है; सरकारी सिक्योरिटीज की भारी मात्रा अक्सर इंश्योरेंस कंपनियों और पेंशन फंड जैसे संस्थागत निवेशकों की मांग से कहीं ज्यादा होती है, जो महंगाई को लेकर काफी संवेदनशील हो रहे हैं। दूसरा, ग्लोबल बॉन्ड मार्केट की अस्थिरता ने लोकल यील्ड को अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड से पूरी तरह अलग होने से रोका है, भले ही RBI अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा है।
स्ट्रक्चरल फिस्कल ड्रिफ्ट का खतरा
एक चिंता यह भी बढ़ रही है कि यह असंतुलन अर्थव्यवस्था पर एक 'साइलेंट टैक्स' की तरह काम कर रहा है। अगर सरकारी बेंचमार्क यील्ड ऊंची बनी रहती है, तो निजी कंपनियों, खासकर उन कंपनियों के लिए जो ग्लोबल मार्केट या बेहतर ट्रेजरी ऑपरेशंस का फायदा नहीं उठा पातीं, कर्ज की लागत ऊंची बनी रहेगी। यह 'क्राउडिंग आउट' (Crowding Out) इफेक्ट तब और बढ़ जाता है जब बैंक लिक्विडिटी मैनेजमेंट को प्राथमिकता देते हुए ग्राहकों को दरों के फायदे को असल अर्थव्यवस्था तक नहीं पहुंचाते। सरकार के लिए, ब्याज दरें कम न कर पाना, खासकर जब मॉनेटरी ईजिंग का दौर चल रहा हो, पारंपरिक पॉलिसी टूल्स के खत्म होने का संकेत देता है। जब तक फिस्कल डेफिसिट को नियंत्रण में नहीं लाया जाता ताकि बॉन्ड मार्केट को भरोसा दिलाया जा सके, तब तक RBI की पॉलिसी और असल मार्केट रेट के बीच यह फासला बना रहने की संभावना है, जो सेंट्रल बैंक के लक्ष्यों को कमजोर करेगा।
