संपत्ति में भारी उछाल, 'वेल्थ टैक्स' पर बढ़ी बहस
Centre for Financial Accountability की एक नई रिपोर्ट चौंकाने वाले आंकड़े पेश करती है। 2019 से 2025 के बीच भारत में अरबपतियों की संख्या में 77% की तेज वृद्धि हुई, वहीं उनकी कुल संपत्ति 227% बढ़कर ₹166 लाख करोड़ के पार पहुंच गई है। यह राशि भारत के कुल GDP का लगभग आधा है। रिपोर्ट के अनुसार, देश के पांच सबसे अमीर परिवारों की संपत्ति इस अवधि में 400% तक बढ़ी है। गौतम अडानी की संपत्ति में 625% का उछाल आया, जबकि मुकेश अंबानी की संपत्ति 153% बढ़ी।
इस बढ़ती आर्थिक खाई को पाटने के लिए 'वेल्थ टैक्स' की मांग फिर से जोर पकड़ रही है। समर्थकों का मानना है कि 2% से 6% तक का प्रोग्रेसिव वेल्थ टैक्स लगाकर सालाना ₹10.63 लाख करोड़ से अधिक राजस्व जुटाया जा सकता है, जिसका इस्तेमाल सामाजिक योजनाओं पर किया जा सकता है। यह नीति खास तौर पर सबसे अमीर व्यक्तियों से जुड़ी कंपनियों, जैसे Reliance Industries (मार्केट कैप ₹18-19 लाख करोड़, P/E 21-22) और Adani Enterprises (मार्केट कैप ₹2.37 लाख करोड़, P/E 17-22) के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
दुनिया भर में 'वेल्थ टैक्स' के अनुभव
दुनियाभर में बढ़ती असमानता और सार्वजनिक धन की जरूरत के चलते 'वेल्थ टैक्स' पर चर्चा तेज है। कई देश कॉरपोरेट आय पर टैक्स लगाना मुश्किल होने के कारण निजी संपत्ति पर टैक्स लगाने के विकल्प तलाश रहे हैं। कोलंबिया और स्विट्जरलैंड जैसे देश अभी भी वेल्थ टैक्स लागू करते हैं, लेकिन कई OECD देशों ने इसे जटिल प्रशासन, कम राजस्व और पूंजी पलायन (capital flight) के डर से हटा दिया है। ऐतिहासिक रूप से, ऐसे टैक्स अक्सर आर्थिक झटकों के बाद 'आपातकालीन' उपाय के तौर पर लाए गए थे, न कि नियमित नीति के रूप में। भारत ने 2016-17 में ही वेल्थ टैक्स को खत्म कर दिया था, क्योंकि इससे बहुत कम राजस्व मिलता था और लागत काफी ज्यादा थी।
समर्थकों का कहना है कि आज के डिजिटल युग में संपत्ति को ट्रैक करना और कर चोरी रोकना आसान है, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में खर्च बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, यह चिंताएं बनी हुई हैं कि ऐसे टैक्स निवेश को हतोत्साहित कर सकते हैं और संपत्ति को देश से बाहर ले जाया जा सकता है। कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि वेल्थ टैक्स, टैक्स चुकाने के लिए कंपनियों को ज्यादा डिविडेंड (Dividend) बांटने पर मजबूर कर सकते हैं, जो लंबे समय में व्यावसायिक निवेश के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
'वेल्थ टैक्स' के खतरे: पूंजी पलायन और निवेश पर चिंता
हालांकि भारत में 'वेल्थ टैक्स' का मकसद असमानता को कम करना है, लेकिन इसके गंभीर जोखिम भी हैं। सबसे बड़ी चिंता पूंजी पलायन (capital flight) की है। अमीर लोग अपनी संपत्ति या टैक्स निवास (tax residency) उन देशों में ले जा सकते हैं जहां टैक्स के नियम बेहतर हों, जैसा कि फ्रांस और स्पेन जैसे देशों में देखा गया है जब उन्होंने ऐसे टैक्स लागू किए। हर साल विभिन्न संपत्तियों का मूल्यांकन करना एक बहुत बड़ा प्रशासनिक काम होगा, और टेक्नोलॉजी के बावजूद कर चोरी या बचने के तरीके खोजना एक चुनौती बनी रहेगी।
'वेल्थ टैक्स' बचत और शेयरों पर मिलने वाले टैक्स-पश्चात रिटर्न (after-tax return) को कम करके उत्पादक निवेश को हतोत्साहित कर सकता है, जिससे व्यावसायिक वृद्धि और उद्यमिता पर असर पड़ सकता है। ऐतिहासिक रूप से, वेल्थ टैक्स से उम्मीद से कम राजस्व मिला है और धन वितरण पर इसका मामूली प्रभाव पड़ा है, जिसके कारण कई देशों ने इसे बंद कर दिया। भारत, जो वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 6.5% से 7.6% की GDP वृद्धि का अनुमान लगा रहा है, के लिए 'वेल्थ टैक्स' एक मुश्किल संतुलनकारी कार्य है। अगर इसे बहुत कठोर या जटिल माना गया, तो यह निवेशकों के भरोसे और कॉर्पोरेट निवेश को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे उस आर्थिक गति पर असर पड़ेगा जो धन का सृजन करती है। ICRA और S&P Global जैसी एजेंसियों की रिपोर्टें भी बताती हैं कि जहां भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है, वहीं ऊर्जा की ऊंची कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव जैसे वैश्विक मुद्दे घरेलू नीतियों से निवेशकों का भरोसा डगमगाने पर बढ़ सकते हैं।
'वेल्थ टैक्स' और आर्थिक विकास का संतुलन
भारत का आर्थिक दृष्टिकोण सकारात्मक बना हुआ है। मजबूत उपभोक्ता खर्च, निवेश में सुधार और स्वस्थ निर्यात के दम पर आने वाले वर्षों में 6.5% से अधिक की वृद्धि का अनुमान है। हालांकि, 'वेल्थ टैक्स' की बहस नीति निर्माताओं को एक महत्वपूर्ण मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है। अंतर्राष्ट्रीय समूह और अर्थशास्त्री अक्सर असमानता को कम करने और सार्वजनिक सेवाओं के वित्तपोषण के लिए प्रोग्रेसिव टैक्सेशन (progressive taxation) का समर्थन करते हैं।
लेकिन इसके व्यावहारिक चुनौतियों और आर्थिक प्रभावों पर करीब से नजर रखी जा रही है। इसकी सफलता मजबूत टैक्स प्रशासन, कर चोरी से लड़ने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और बड़े पैमाने पर पूंजी पलायन या निवेश को हतोत्साहित करने से बचने के लिए कर दरों को सावधानी से तय करने पर निर्भर करेगी। अंतिम परिणाम टैक्स के विशिष्ट डिजाइन, संबंधित राजकोषीय उपायों और आर्थिक निष्पक्षता को सतत, व्यापक-आधारित वृद्धि के साथ संतुलित करने में सरकार के कौशल पर टिका होगा। बाजार निश्चित रूप से इस जटिल मुद्दे पर नीति निर्माताओं के रुख पर बारीकी से नजर रखेगा।