मजबूत बैलेंस शीट से RBI को मिली सहूलियत
भारत की इंटरनेशनल बैलेंस शीट में आया सुधार, जो संपत्ति-से-देनदारी के बढ़ते अनुपात से साफ झलकता है, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) को अपनी मॉनेटरी पॉलिसी तय करने में अधिक लचीलापन प्रदान कर रहा है। यह बेहतर फाइनेंशियल पोजीशन मुख्य रूप से भारतीय कंपनियों और व्यक्तियों द्वारा विदेशों में पूंजी निवेश को बढ़ाने का नतीजा है। लेकिन, इस ऊपरी सुधार के पीछे कुछ महत्वपूर्ण बदलाव भी छिपे हैं, जैसे कि भारत में विदेशी इक्विटी निवेश में आई उल्लेखनीय गिरावट और देश की बाहरी देनदारियों में कर्ज का बढ़ता हिस्सा।
IIP के आंकड़े: संपत्ति में वृद्धि, पर निवेश पर सवाल
RBI द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 के अंत तक भारत की इंटरनेशनल इन्वेस्टमेंट पोजीशन (IIP) में सुधार दर्ज किया गया। देश का इंटरनेशनल संपत्ति-से-देनदारी का अनुपात बढ़कर 82.1% पर पहुंच गया, जो एक साल पहले 74.6% था। दो साल पहले यह अनुपात 71.4% था, जो धीरे-धीरे बढ़कर 81.3% (सितंबर 2025 तक) और फिर 82.1% (दिसंबर 2025 तक) हो गया। यह वृद्धि भारतीय निवासियों की विदेश में बढ़ी हुई होल्डिंग्स के कारण हुई। तिमाही के दौरान, आउटवर्ड डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट $7.6 बिलियन बढ़ा और करेंसी व डिपॉजिट होल्डिंग्स में $9.4 बिलियन का इजाफा हुआ। कुल रिजर्व एसेट्स $12.4 बिलियन घटकर $687.7 बिलियन रह गए, लेकिन साल-दर-साल इनमें 8.2% की वृद्धि दर्ज की गई। हालांकि, फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व में साप्ताहिक उतार-चढ़ाव भी देखे गए, जैसे 20 मार्च 2026 को समाप्त सप्ताह में $11.4 बिलियन की कमी आई, जिसका मुख्य कारण सोने के रिजर्व में गिरावट थी।
चिंता का विषय: इक्विटी में कमी, कर्ज में बढ़ोतरी
जहां एक ओर देश की बाहरी बैलेंस शीट सुधर रही है, वहीं देनदारियों (Liabilities) के मिश्रण पर गौर करने से कुछ चिंताजनक संकेत मिलते हैं। दिसंबर 2025 की तिमाही में, भारत में विदेशी स्वामित्व वाली संपत्तियों में मामूली वृद्धि हुई, जो मुख्य रूप से ट्रेड क्रेडिट ( $11.4 बिलियन की वृद्धि) से आई। हालांकि, इनवर्ड डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट ( $3.2 बिलियन की गिरावट) और पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट ( $2.8 बिलियन की गिरावट) में आई कमी यह दर्शाती है कि भारत में सीधे निवेश को लेकर विदेशी कंपनियों की रुचि कम हो रही है।
इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात कर्ज (Debt) पर बढ़ती निर्भरता है। कुल बाहरी देनदारियों में कर्ज का हिस्सा दिसंबर 2025 के अंत तक बढ़कर 55.3% हो गया, जो पिछली तिमाही में 54.8% था। इक्विटी से कर्ज-आधारित देनदारियों की ओर यह बदलाव भारत को वैश्विक ब्याज दर चक्रों और अस्थिर पूंजी प्रवाह के जोखिमों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। इससे रुपए में गिरावट और घरेलू वित्तीय स्थितियों के और टाइट होने का खतरा बढ़ सकता है। फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) भी सतर्क दिख रहे हैं, 2025 और 2026 की शुरुआत में भारतीय शेयरों से महत्वपूर्ण आउटफ्लो देखा गया है, जिससे कुछ क्षेत्रीय साथियों की तुलना में प्रदर्शन कमजोर रहा है।
भविष्य का दृष्टिकोण: अनिश्चितताओं के बीच उम्मीद
आगे चलकर, मजबूत घरेलू मांग, सेवाओं के निर्यात और स्थिर पूंजी प्रवाह के सहारे भारत का बाहरी क्षेत्र मजबूत बने रहने की उम्मीद है। भारतीय सॉवरेन बॉन्ड का वैश्विक सूचकांकों में शामिल होना पूंजी प्रवाह को और बढ़ावा दे सकता है, जिससे सरकारी उधारी लागत कम हो सकती है। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) और देश की बाहरी स्थिति पर विश्वास जताया है। विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएं बनी रहेंगी, लेकिन भारत के मजबूत आर्थिक फंडामेंटल और सक्रिय नीतियां निरंतर विकास और निवेश के लिए एक अनुकूल माहौल प्रदान करती हैं। RBI द्वारा विनिमय दर की अस्थिरता का प्रबंधन और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार बनाए रखना गतिशील वैश्विक वित्तीय माहौल में नेविगेट करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।