Ayushman Bharat से दिल के मरीजों को झटका! स्टडी में खुला बड़ा राज, खर्चों का बोझ असहनीय

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AuthorAditya Rao|Published at:
Ayushman Bharat से दिल के मरीजों को झटका! स्टडी में खुला बड़ा राज, खर्चों का बोझ असहनीय
Overview

आयुष्मान भारत (Ayushman Bharat) योजना के बावजूद, भारत में दिल की बीमारियों (Heart Failure) से जूझ रहे ज़्यादातर मरीज़ों को कोई खास फाइनेंशियल प्रोटेक्शन (Financial Protection) नहीं मिल पा रहा है। एक नई स्टडी बताती है कि ऐसे सात में से दस मरीज़ों को अपने इलाज का **90%** से ज़्यादा खर्च खुद उठाना पड़ता है, जिससे वे गंभीर फाइनेंशियल डिस्ट्रेस (Financial Distress) में चले जाते हैं।

यह स्टडी भारत में दिल की बीमारियों के फाइनेंशियल इम्पैक्ट (Financial Impact) को गहराई से उजागर करती है। पता चला है कि मौजूदा सरकारी हेल्थ प्रोग्राम्स (Health Programs) क्रॉनिक (Chronic) यानी लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों के लिए पर्याप्त सुरक्षा देने में नाकाम हैं। यह नेशनल हेल्थ पॉलिसीज़ (National Health Policies) में एक बड़ी कमी को दर्शाता है, जिसका असर न सिर्फ़ लोगों की भलाई पर पड़ रहा है, बल्कि देश की इकोनॉमी (Economy) पर भी भारी पड़ रहा है।

मरीज़ों पर भारी पड़ता है खर्च (Patients Face Crippling Costs)

दिल की बीमारियों के मरीज़ों की आर्थिक हालत बेहद चिंताजनक है। रिसर्च बताती है कि दस में से सात हार्ट फेलियर (Heart Failure) के मरीज़ों के पास कोई फाइनेंशियल सेफ्टी नेट (Financial Safety Net) नहीं है। इसका मतलब है कि हेल्थ कॉस्ट (Health Costs) का 92.6% तक खर्च उन्हें अपनी जेब से देना पड़ता है। इंश्योरेंस (Insurance) न होने की सूरत में, लगभग सारा खर्च आउट-ऑफ-पॉकेट (Out-of-pocket) होता है। औसतन, एक मरीज़ पर सालाना ₹1,06,566 का आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च आता है, जो कई परिवारों के लिए बहुत बड़ी रकम है। सिर्फ़ एक हॉस्पिटलाइजेशन (Hospitalisation) का खर्च करीब ₹1.19 लाख तक जा सकता है, जबकि मीडियन कॉस्ट (Median Cost) लगभग ₹49,600 है। इस फाइनेंशियल प्रेशर के चलते मरीज़ों को अपनी सेविंग्स (Savings) का 68% इस्तेमाल करना पड़ता है, रिश्तेदारों से मदद लेनी पड़ती है (54%), या उनसे लोंस (Loans) लेने पड़ते हैं (15%)। नतीजा यह है कि एक तिहाई से ज़्यादा परिवार (37.7%) कैटास्ट्रॉफिक हेल्थ स्पेंडिंग (Catastrophic Health Spending) का सामना कर रहे हैं, और लगभग पांच में से एक (17.7%) डिस्ट्रेस फाइनेंसिंग (Distress Financing) का सहारा ले रहे हैं, जिसमें अक्सर लोंस या फैमिली एड (Family Aid) शामिल होता है। यह फाइनेंशियल मुश्किलें महिलाओं, ग्रामीण इलाकों के लोगों, बेरोज़गारों और कम पढ़े-लिखे लोगों को ज़्यादा प्रभावित करती हैं, जिससे सोशल और इकोनॉमिक इनइक्वालिटीज़ (Social and Economic Inequalities) बढ़ती हैं।

क्रॉनिक केयर के लिए आयुष्मान भारत की सीमित पहुंच (Ayushman Bharat's Limited Reach for Chronic Care)

हालांकि, आयुष्मान भारत प्रधान मंत्री जन आरोग्य योजना (AB-PMJAY) जैसी स्कीम्स का मकसद यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (Universal Health Coverage) देना है, लेकिन क्रॉनिक डिज़ीज़ेज़ (Chronic Diseases) जैसे हार्ट फेलियर के लिए इनकी इफेक्टिवनेस (Effectiveness) सीमित है। रिपोर्ट्स से पता चला है कि ₹5 लाख तक के सालाना कवरेज के बावजूद, क्रॉनिक डिज़ीज़ेज़ को मैनेज करने के लिए अवेयरनेस (Awareness), एनरोलमेंट (Enrollment) और असली एक्सेस (Access) को लेकर बड़ी समस्याएं हैं। खास बात यह है कि 2024 में पब्लिश हुई एक रिसर्च में पाया गया कि AB-PMJAY के तहत एनरोलमेंट से हॉस्पिटल विज़िट्स (Hospital Visits) में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई, आउट-ऑफ-पॉकेट स्पेंडिंग (Out-of-pocket Spending) कम नहीं हुई, और न ही कैटास्ट्रॉफिक हेल्थ स्पेंडिंग (Catastrophic Health Spending) में कोई कमी आई। इससे यह ज़ाहिर होता है कि यह स्कीम शायद सिर्फ़ खास प्रोसीजर (Procedures) या एक्यूट इवेंट्स (Acute Events) में मदद करती है, लेकिन क्रॉनिक HF मैनेजमेंट के लगातार फाइनेंशियल स्ट्रेन (Financial Strain) को कम नहीं कर पाती। पब्लिक फंडिंग (Public Funding) का फोकस सेकेंडरी और टर्शियरी केयर (Secondary and Tertiary Care) पर ज़्यादा है, जबकि हाल के सालों में प्राइमरी हेल्थकेयर (Primary Healthcare) पर सरकारी खर्च में कमी देखी गई है।

इकोनॉमिक इम्पैक्ट: वर्किंग-एज इंडियंस पर दिल की बीमारी का वार (Economic Impact: Heart Failure Strikes Working-Age Indians)

दिल की बीमारी भारत की इकोनॉमिक पोटेंशियल (Economic Potential) पर भी गहरा असर डालती है, क्योंकि यह बीमारी अक्सर लोगों के सबसे प्रोडक्टिव इयर्स (Productive Years) में हमला करती है। स्टडी में मरीज़ों की औसत उम्र 55 साल थी, जो पश्चिमी देशों के मुकाबले 10-15 साल कम है। इसका मतलब है कि बीमारी लोगों के पीक अर्निंग कैपेसिटी (Peak Earning Capacity) के दौरान प्राइमरी अर्नर्स (Primary Earners) को अक्षम कर सकती है, जिससे प्रोडक्टिविटी लॉसेज़ (Productivity Losses) और बिज़नेस इनोवेशन (Business Innovation) पर बुरा असर पड़ता है। नॉन-कम्युनिकेबल डिसीज़ेज़ (Non-communicable Diseases) की वजह से होने वाला कुल इकोनॉमिक लॉस (Economic Loss) बहुत बड़ा है; एक अनुमान के मुताबिक 2012 से 2030 के बीच $4.58 ट्रिलियन का लॉस हो सकता है। ह्यूमन कैपिटल (Human Capital) में यह कमी हाउसहोल्ड सेविंग्स (Household Savings) को घटाती है, नेशनल इन्वेस्टमेंट (National Investment) को सीमित करती है और इकोनॉमिक ग्रोथ (Economic Growth) में बाधा डालती है।

भारत की हेल्थकेयर फंडिंग की चुनौतियां (India's Healthcare Funding Challenges)

भारत का ओवरऑल हेल्थकेयर फंडिंग सिस्टम (Healthcare Funding System) भी कई इनएफिशिएंसीज़ (Inefficiencies) से जूझ रहा है, जो मरीज़ों पर फाइनेंशियल बर्डन (Financial Burden) बढ़ाती हैं। देश अपने जीडीपी (GDP) का करीब 3.7% हेल्थकेयर पर खर्च करता है, जो दूसरे डेवलपिंग इकोनॉमीज़ (Developing Economies) जैसा ही है, लेकिन हेल्थ आउटकम्स (Health Outcomes) इस खर्च के मुकाबले नहीं हैं। यह मिसएलोकेशन (Misallocation) या इनएफिशिएंसीज़ (Inefficiencies) की ओर इशारा करता है। टोटल हेल्थ एक्सपेंडिचर (Total Health Expenditure) का लगभग 50% हाउसहोल्ड्स अपनी जेब से देते हैं, जो दुनिया के सबसे ऊंचे रेट्स में से एक है। आउट-ऑफ-पॉकेट स्पेंडिंग (Out-of-pocket Spending) पर यह निर्भरता रिग्रेसिव (Regressive) है और लोगों को गरीबी की ओर धकेलती है। इसके अलावा, HF जैसी क्रॉनिक लाइफस्टाइल डिसीज़ेज़ (Chronic Lifestyle Diseases) को प्रिवेंट (Prevent) करने के मुकाबले ट्रीट (Treat) करना ज़्यादा महंगा होता है, जिसके लिए ऑनगोइंग केयर (Ongoing Care) और मेडिकेशन (Medication) की ज़रूरत होती है, और इससे आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंसेस (Out-of-pocket Expenses) बढ़ते हैं। हेल्थ इंश्योरेंस मार्केट (Health Insurance Market) भी फ्रेग्मेंटेड (Fragmented) है; तीन में से दो एडल्ट्स (Adults) इंश्योर्ड (Insured) नहीं हैं, और कई मिडिल-इंकम इंडिविजुअल्स (Middle-income Individuals) AB-PMJAY जैसी स्कीम्स के गैप्स में आ जाते हैं।

पॉलिसी गैप्स मरीज़ों को बनाते हैं कमज़ोर (Policy Gaps Leave Patients Vulnerable)

मौजूदा पॉलिसी फ्रेमवर्क (Policy Framework) क्रॉनिक हार्ट फेलियर (Chronic Heart Failure) से होने वाली फाइनेंशियल डेवेस्टेशन (Financial Devastation) से निपटने के लिए तैयार नहीं दिखता। जहां आयुष्मान भारत एक्यूट केयर (Acute Care) के लिए एक सेफ्टी नेट (Safety Net) प्रदान करता है, वहीं क्रॉनिक डिज़ीज़ मैनेजमेंट (Chronic Disease Management) की लॉन्ग-टर्म (Long-term) और एस्केलेटिंग कॉस्ट्स (Escalating Costs) को कवर करने में इसकी सीमाएं इसे कई HF मरीज़ों को गंभीर फाइनेंशियल हार्डशिप (Financial Hardship) के सामने छोड़ देती हैं। आउट-ऑफ-पॉकेट स्पेंडिंग (Out-of-pocket Spending) पर लगातार निर्भरता, और बीमारी का युवा, प्रोडक्टिव लोगों को टारगेट करना, हाउसहोल्ड इकोनॉमिक स्टेबिलिटी (Household Economic Stability) और ओवरऑल इकोनॉमिक ग्रोथ (Overall Economic Growth) के लिए एक बड़ा खतरा पैदा करता है। क्रॉनिक कंडीशंस (Chronic Conditions) के लिए मज़बूत फाइनेंशियल प्रोटेक्शन (Financial Protection) की कमी सिर्फ़ एक हेल्थकेयर समस्या नहीं, बल्कि एक इकोनॉमिक वल्नरेबिलिटी (Economic Vulnerability) है जो भारत के डेवलपमेंट (Development) में बाधा डाल सकती है। वर्तमान अप्रोच क्रॉनिक डिज़ीज़ेज़ को लॉन्ग-टर्म मैनेज करने के बजाय बीमारी को ट्रीट करने को प्राथमिकता देता है, जिससे डेट (Debt) और डिसेबिलिटी (Disability) का एक ऐसा चक्र बनता है जो नेशनल ह्यूमन कैपिटल डेवलपमेंट (National Human Capital Development) को बाधित करता है।

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