नए फाइनेंशियल ईयर की शुरुआत में India की इकोनॉमी ने रफ्तार पकड़ी है। HSBC Flash Composite PMI अप्रैल में बढ़कर 58.3 हो गया, जो मार्च के 57.0 से काफी बेहतर है। यह डोमेस्टिक डिमांड में मजबूती का इशारा है, भले ही प्राइवेट सेक्टर फर्म्स को हायर इनपुट कॉस्ट और ग्लोबल अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ रहा है। सर्विसेज सेक्टर में भी ग्रोथ जारी रही, PMI 57.9 पर रहा, जो India की इकोनॉमिक ग्रोथ में इस सेक्टर की अहम भूमिका को दर्शाता है।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में जोरदार वापसी
अप्रैल की रिकवरी में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने सबसे अहम भूमिका निभाई। इसका PMI सुधरकर 55.9 हो गया, जो मार्च के 53.9 से एक बड़ा उछाल है। पिछले महीने के चार साल के निचले स्तर से यह वापसी काफी अहम है। आउटपुट और न्यू ऑर्डर्स में तेज ग्रोथ ने इस रिकवरी को गति दी। फर्म्स सप्लाई चेन में संभावित गड़बड़ियों से बचने के लिए स्टॉक बढ़ा रही हैं, खासकर जारी जियोपॉलिटिकल टेंशन के चलते। हालांकि, इन चिंताओं के बीच इनपुट कॉस्ट में तेज बढ़ोतरी देखी गई, जो पिछले 3.5 सालों में सबसे ज्यादा है। फ्यूल और मेटल जैसी चीजों के दाम तेजी से बढ़े हैं।
महंगाई का बढ़ता खतरा
इन पॉजिटिव आंकड़ों के बावजूद, इन्फ्लेशन (महंगाई) एक लगातार चुनौती बनी हुई है। बिजनेस फर्म्स ने इनपुट कॉस्ट बढ़ने के कारण सेलिंग प्राइस भी बढ़ा दिए हैं। यह ट्रेंड चिंताजनक है, खासकर वेस्ट एशिया में जारी संघर्ष के कारण जो ग्लोबल एनर्जी और फ्रेट कॉस्ट में वोलेटिलिटी ला रहा है। ब्रेंट क्रूड का $100 प्रति बैरल के करीब पहुंचना India के इन्फ्लेशन आउटलुक और एक्सटर्नल बैलेंस के लिए सीधा खतरा है। Moody's Analytics का अनुमान है कि India में इन्फ्लेशन 4.5% तक पहुंच सकता है, जो एशिया-पैसिफिक रीजन में सबसे ज्यादा है।
RBI के लिए मुश्किल चुनौती
वेस्ट एशिया का संघर्ष India को सप्लाई चेन में रुकावटों, ऊंची एनर्जी कीमतों और मार्केट की अनिश्चितता के जरिए प्रभावित कर रहा है। ये जियोपॉलिटिकल मुद्दे सप्लाई चेन की समस्याओं को लंबा खींच सकते हैं, जिससे ग्रोथ धीमी हो सकती है और महंगाई बढ़ सकती है। इतिहास गवाह है कि ऐसे संकटों ने रुपये में बड़ी गिरावट को जन्म दिया है, जैसे FY26 में करेंसी 9.9% गिरी थी, जो 2012 के बाद की सबसे बड़ी सालाना गिरावट थी। ऐसे में Reserve Bank of India (RBI) के सामने एक मुश्किल संतुलन साधने की चुनौती है: एक तरफ ग्रोथ को सपोर्ट करना है, तो दूसरी तरफ महंगाई को काबू में रखना है। RBI ने 8 अप्रैल की अपनी मीटिंग में पॉलिसी रेपो रेट 5.25% पर बरकरार रखा, जो सावधानी का संकेत है। RBI ने 2026-27 के लिए GDP ग्रोथ 6.9% और कोर इन्फ्लेशन 4.4% रहने का अनुमान लगाया है, जो बाहरी झटकों के बावजूद टिकाऊ महंगाई को कम करने पर फोकस दिखा रहा है।
इकोनॉमी की छिपी कमजोरियां
PMI के मौजूदा आंकड़े रिकवरी का संकेत दे रहे हैं, लेकिन इकोनॉमी में कुछ कमजोरियां भी मौजूद हैं। India कच्चे तेल के इंपोर्ट पर भारी निर्भर है (लगभग 88% जरूरतें इंपोर्ट होती हैं), जो इसे ग्लोबल प्राइस शॉक और सप्लाई डिसरप्शन के प्रति संवेदनशील बनाता है, खासकर वेस्ट एशिया क्षेत्र से। कच्चे तेल की कीमत में हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी India के सालाना इंपोर्ट बिल को $13-14 बिलियन बढ़ा सकती है, जिसका सीधा असर इन्फ्लेशन और करंट अकाउंट डेफिसिट पर पड़ेगा। ऊंची एनर्जी और कमोडिटी कीमतों से होने वाली कॉस्ट-पुश इन्फ्लेशन, साथ ही सप्लाई चेन की दिक्कतें, अगर जियोपॉलिटिकल संकट जारी रहा तो 'स्टैगफ्लेशन' (stagflation - धीमी ग्रोथ और ऊंची महंगाई का दोहरा झटका) को जन्म दे सकती हैं। RBI का काम इसलिए और मुश्किल हो जाता है क्योंकि इंपोर्टेड इन्फ्लेशन घरेलू स्तर पर कीमतों में व्यापक बढ़ोतरी को बढ़ावा दे सकता है, जिससे महंगाई कंट्रोल करने के लिए ग्रोथ का बलिदान देना पड़ सकता है। उन देशों के विपरीत जिनके पास एनर्जी के मामले में अधिक आत्मनिर्भरता है, India की इकोनॉमी इन बाहरी प्राइस शॉक के प्रति ज्यादा एक्सपोज्ड है।
