भारत की AI रणनीति: समझदारी भरी एंट्री, महंगी ग्लोबल रेस से बाहर

ECONOMY
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
भारत की AI रणनीति: समझदारी भरी एंट्री, महंगी ग्लोबल रेस से बाहर
Overview

भारत के आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey) 2025-26 में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर एक नई और प्रैक्टिकल रणनीति का प्रस्ताव दिया गया है। इसमें कहा गया है कि भारत को AI की महंगी और रिसोर्स-इंटेंसिव ग्लोबल रेस में कूदने के बजाय, एक सोची-समझी और देर से एंट्री करनी चाहिए।

AI की ग्लोबल दौड़: महंगा सौदा?

सर्वेक्षण में इस बात पर जोर दिया गया है कि जो देश AI में शुरुआती दौर में आगे बढ़े, उन्हें अब भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। वे एनर्जी-इंटेंसिव टेक्नोलॉजी, अनिश्चित रेवेन्यू मॉडल और बड़े फाइनेंशियल कमिटमेंट्स में फंसे हुए हैं। ऐसे में, भारत को इस महंगे रास्ते से बचने का मौका मिल रहा है। देर से एंट्री करके, भारत दूसरे देशों की गलतियों से सीख सकता है और अपनी पॉलिसी व इनोवेशन को बेहतर तरीके से प्लान कर सकता है। इससे भारी-भरकम खर्च और रिसोर्स पर निर्भरता जैसी समस्याओं से बचा जा सकता है।

कैपिटल-इंटेंसिव AI मॉडल से दूरी

दुनिया भर में सबसे एडवांस्ड AI मॉडल और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का खेल बेहद महंगा साबित हो रहा है। अनुमान है कि 2030 तक AI से जुड़े डेटा सेंटर कैपेक्स (CapEx) में $5.2 ट्रिलियन तक खर्च हो सकते हैं। कुछ एनालिस्ट्स का मानना है कि 2030 तक डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर पर सालाना खर्च $1 ट्रिलियन को पार कर सकता है। IBM के CEO अरविंद कृष्णा ने चेतावनी दी है कि एक सिंगल 1-गीगावाट (GW) AI डेटा सेंटर को तैयार करने में करीब $80 बिलियन का खर्च आता है। अगर दुनिया भर में 100 GW क्षमता का लक्ष्य रखा जाए, तो यह खर्च $8 ट्रिलियन तक पहुंच सकता है। कृष्णा के मुताबिक, यह रकम इतनी बड़ी है कि AI हार्डवेयर के 5-साल के डेप्रिसिएशन साइकिल को देखते हुए, सिर्फ इंटरेस्ट पेमेंट के लिए हर साल $800 बिलियन का प्रॉफिट कमाना पड़ेगा, जो कि सस्टेनेबल नहीं है।

भारत की एप्लीकेशन-ड्रिवन स्ट्रैटेजी

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत इस वित्तीय रूप से खतरनाक रास्ते से बच सकता है। इसके लिए, भारत को फ्रंटियर AI स्केल पर सीधे मुकाबला करने के बजाय, एप्लीकेशन-लेड इनोवेशन पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही, देश के अपने डोमेस्टिक डेटा, ह्यूमन कैपिटल और साझा इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल करना चाहिए।

डेटा सेंटर ग्रोथ: चुनौतियां बरकरार

भारत में डिजिटल क्रांति के चलते डेटा सेंटर की क्षमता तेजी से बढ़ रही है। यह 2030 तक बढ़कर करीब 8 GW तक पहुंचने का अनुमान है, जो कि 2025 के मध्य में लगभग 1.4 GW था। इस ग्रोथ की वजह बढ़ता डेटा कंजम्पशन, क्लाउड अडॉप्शन और AI वर्कलोड हैं। गूगल $15 बिलियन का AI कैंपस विशाखापत्तनम में बना रहा है, और रिलायंस भी जामनगर में $15 बिलियन का 1 GW AI-रेडी डेटा सेंटर लगाने की योजना बना रहा है।

लेकिन, सर्वेक्षण यह भी बताता है कि अंधाधुंध स्केलिंग में कुछ बड़ी बाधाएं हैं: बिजली की उपलब्धता, फाइनेंस तक पहुंच और सबसे खास, पानी जैसे रिसोर्स। दुनिया भर के अनुभव बताते हैं कि AI-ड्रिवन डेटा सेंटर एक्सपेंशन एनर्जी सिस्टम पर भारी दबाव डालता है। 2030 तक ग्लोबल डेटा सेंटर इलेक्ट्रिसिटी कंजम्पशन दोगुना होने का अनुमान है, और AI-ऑप्टिमाइज्ड सेंटर की डिमांड चार गुनी हो जाएगी। इसलिए, भारत की रणनीति रिसोर्स एफिशिएंसी पर केंद्रित है। यह पब्लिक ऑब्जेक्टिव्स के साथ तालमेल बिठाते हुए, छोटे, टास्क-स्पेसिफिक मॉडल को बढ़ावा देगी, जो लिमिटेड हार्डवेयर और डीसेंट्रलाइज्ड नेटवर्क पर चल सकें।

बजट में AI के लिए आवंटन

फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के बजट से पहले, सरकार AI इकोसिस्टम बनाने के लिए प्रतिबद्ध दिख रही है। बजट 2025-26 में AI के लिए ₹2,200 करोड़ का फंड आवंटित किया गया था, जिसमें से ₹2,000 करोड़ इंडियाएआई मिशन (IndiaAI Mission) के लिए थे।

सर्वेक्षण एक बॉटम-अप स्ट्रैटेजी की वकालत करता है, जो ओपन और इंटरऑपरेबल सिस्टम, सेक्टर-स्पेसिफिक मॉडल और साझा इंफ्रास्ट्रक्चर पर आधारित हो। इस तरह, AI को एक पब्लिक गुड (Public Good) बनाया जा सकता है। कुल मिलाकर, यह प्रैक्टिकल, इकोनॉमिकली ग्राउंडेड और सोशली रिस्पॉन्सिव AI पर फोकस करने की रणनीति है, ताकि केवल टेक्नोलॉजी रेस में भाग लेने के बजाय असली दुनिया की समस्याओं को हल करके वैल्यू बनाई जा सके।

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