भारत में AI का दौर, पर असली 'हीरो' है इंसानी तालमेल!

ECONOMY
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
भारत में AI का दौर, पर असली 'हीरो' है इंसानी तालमेल!
Overview

भारतीय पेशेवर AI को प्रोडक्टिविटी बढ़ाने वाला मानते हैं, लेकिन **85%** लोग मानते हैं कि असल परफॉरमेंस में बड़ा हाथ तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले तालमेल का है। यह एक 'प्रोडक्टिविटी पैराडॉक्स' (Productivity Paradox) को उजागर करता है।

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AI का असर बनाम इंसानी सहयोग

साल 2026 तक भारत का वर्कफोर्स एक बड़े 'प्रोडक्टिविटी पैराडॉक्स' का सामना कर रहा है। Randstad Workmonitor 2026 India रिपोर्ट के अनुसार, 89% पेशेवर मानते हैं कि AI उनकी प्रोडक्टिविटी बढ़ाता है, लेकिन एक बड़ा 85% लोग क्रॉस-जनरेशनल टीमवर्क (cross-generational teamwork) को असली परफॉरमेंस बढ़ाने वाला मानते हैं। यह दिखाता है कि AI जहां कामों को तेज करता है, वहीं इंसानी समझ और टीम के तौर पर काम करना लंबी अवधि की सफलता के लिए बहुत जरूरी है।

AI अपनाने की राह की मुश्किलें

भारत का IT सेक्टर, जो 2026 तक $350 बिलियन का होने का अनुमान है, AI में भारी निवेश कर रहा है। Tata Consultancy Services, Infosys और Wipro जैसी कंपनियां पार्टनरशिप बना रही हैं और Microsoft Copilot जैसे टूल्स लॉन्च कर रही हैं। हालांकि, भारत में एंटरप्राइज लेवल पर जनरेटिव AI का इस्तेमाल 40% से कम है। इसकी वजह गवर्नेंस (governance), स्किल गैप (skill gap) और मौजूदा सिस्टम में नई तकनीक को इंटीग्रेट करने की चुनौतियाँ हैं। यह दर्शाता है कि टेक खर्च और AI के इंसानी स्किल्स को पूरी तरह बढ़ाने की क्षमता के बीच एक खाई है। ग्लोबल स्तर पर 77% वर्कर्स मानते हैं कि AI ने उनका वर्कलोड बढ़ाया है, और यही भावना भारत में भी है, जहां AI का मुख्य रोल कामों को तेज करना है, न कि इंसानी समझ को बदलना।

'अपनेपन' से लॉयल्टी कैसे बनाएं

बढ़ते आर्थिक दबाव के बीच, 'रिटर्न ऑन बिलॉन्गिंग' (return on belonging) एक अहम फोकस बन गया है। बढ़ती कीमतों से निपटने के लिए 58% भारतीय पेशेवर दूसरी नौकरी कर रहे हैं, ऐसे में काम पर भरोसा और कनेक्शन बनाना बहुत जरूरी है। हमदर्द मैनेजर जो करियर ग्रोथ में मदद करते हैं, वो मजबूत लॉयल्टी और अतिरिक्त प्रयास बढ़ाते हैं – जो AI नहीं कर सकता। आगे की सोचने वाली कंपनियां अपने वर्कफोर्स को तालमेल का एक नेटवर्क मानती हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि जो बिजनेस इस इंसानी अप्रोच को प्राथमिकता देते हैं, उनमें एम्प्लॉई टर्नओवर (employee turnover) कम होता है, खासकर टॉप परफॉर्मर्स के बीच।

AI के खतरे: नौकरी और असमानता

सिर्फ AI एफिशिएंसी पर ध्यान देना जोखिम भरा हो सकता है। AI सेल्स, कस्टमर सपोर्ट और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट जैसे कई एंट्री-लेवल जॉब्स को डिस्टर्ब कर सकता है, जिससे आय असमानता (income inequality) और बढ़ सकती है। भारत के IT सेक्टर में एम्प्लॉई कॉस्ट ग्रोथ (employee cost growth) में भारी गिरावट आई है, जो 2022-23 में 19% सालाना से घटकर 2024-25 में 5% रह गई है। नौकरी खोने और इंसानी कनेक्शन को खोने की चिंता वाला वर्कफोर्स कम मोराल (morale) दिखा सकता है। ऑटोमेशन पर बहुत ज्यादा भरोसा या कम इंसानी निगरानी से बड़े ऑपरेशनल इश्यूज और कंपनी का ज्ञान खोने का खतरा होता है। AI का फायदा बड़े पैमाने पर ज्यादा कमाने वालों को मिलने से अमीरी के बढ़ते फासले को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं।

भविष्य की राह: इंसानी समझ ही है कुंजी

भारत की इकोनॉमी के 7.4% की ग्रोथ के अनुमान के बीच, इसका भविष्य का फायदा AI को अपने मजबूत इंसानी वर्कफोर्स के साथ मिलाने पर निर्भर करेगा। टेक्नोलॉजी आउटपुट बढ़ा सकती है, लेकिन इंसानी कनेक्शन और समझ स्ट्रेटेजी और लॉन्ग-टर्म वैल्यू को दिशा देते हैं। एनालिस्ट्स (analysts) IT सेक्टर में स्थिर, शायद थोड़ी धीमी ग्रोथ की उम्मीद कर रहे हैं, जिसमें मिड-कैप कंपनियां बड़ी कंपनियों से बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। कंपनियों के लिए मुख्य बात एक 'ह्यूमन-फर्स्ट' अप्रोच (human-first approach) होगी: टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल इंसानी स्किल्स को बढ़ाने के लिए करना, न कि उन्हें बदलने के लिए, ताकि ग्लोबल स्तर पर सच्ची रेजिलिएंस (resilience) और इनोवेशन (innovation) बनाया जा सके।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.