एम्बेसडर विनय मोहन क्वात्रा की इन बातों पर गौर करना जरूरी है। एक तरफ जहां भारत मजबूत आर्थिक ग्रोथ दिखा रहा है, वहीं दूसरी तरफ दुनिया का रुख ओपन ग्लोबलाइजेशन से हटकर 'कंट्रोल रेजीम्स' की ओर बढ़ रहा है।
ग्लोबल प्रोटेक्शनिज्म का बढ़ता ट्रेंड
जियोपॉलिटिकल टेंशन, टेक्नोलॉजी वॉर और सप्लाई चेन की सुरक्षा की चिंताओं के चलते अमेरिका, यूरोपीय यूनियन और चीन जैसे देश बड़े पैमाने पर इंडस्ट्रियल पॉलिसी, भारी सब्सिडी और एक्सपोर्ट कंट्रोल जैसे कदम उठा रहे हैं। यह दशकों की मार्केट-फ्रेंडली नीतियों से एक बड़ा बदलाव है, जो वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता और ट्रेड डिस्प्यूट्स बढ़ा सकता है।
भारत की मजबूत ग्रोथ के कारण
भारत की ग्रोथ की बात करें तो, यह लगातार 7% से ऊपर बनी हुई है, कुछ क्वार्टर में तो यह 7.4% और 7.8% तक भी पहुंची है। यह दुनिया की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ने वाली बड़ी इकोनॉमी है। इसका मुख्य कारण है घरेलू कंज्यूमर स्पेंडिंग, जिसमें निवेश और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का भी अच्छा योगदान है। एम्बेसडर क्वात्रा ने गवर्नेंस में सुधार, आसान फाइनेंशियल एक्सेस और एनर्जी व फूड जैसे की-एरिया में कोऑर्डिनेशन को इस ग्रोथ का आधार बताया है। फिजिकल और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में भी बड़े इन्वेस्टमेंट हुए हैं। हालांकि, सर्विस सेक्टर और कम प्रोडक्टिविटी वाली एग्रीकल्चर पर निर्भरता, स्किल्ड वर्कर्स की कमी जैसी चुनौतियां अभी भी हैं।
भारत कैसे कर रहा है नेविगेट?
दुनिया भर में बढ़ता 'कंट्रोल रेजीम' और प्रोटेक्शनिज्म भारत के लिए एक जटिल स्थिति पैदा करता है। 'आत्मनिर्भर भारत' जैसे कदम भारत की सेल्फ-रिलायंस की कोशिशों को दर्शाते हैं। लेकिन, दूसरे देशों के प्रोटेक्शनिज्म से भारत के एक्सपोर्ट के मौके और ग्लोबल सप्लाई चेन में जुड़ने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। भारत को अपनी ग्रोथ को बनाए रखने के लिए यह संतुलन साधना होगा कि वह डोमेस्टिक कैपेसिटी कैसे बढ़ाए और साथ ही ओपन मार्केट एक्सेस कैसे सुनिश्चित करे।
ग्रोथ आउटलुक पर खतरे
इस ग्लोबल ट्रेंड से भारत के ग्रोथ आउटलुक पर कई खतरे मंडरा रहे हैं। बढ़ती प्रोटेक्शनिस्ट पॉलिसीज सप्लाई चेन को बाधित कर सकती हैं, विदेशी निवेश को हतोत्साहित कर सकती हैं और ट्रेड रिटेलिएशन (जवाबी कार्रवाई) को जन्म दे सकती हैं, जिससे एक्सपोर्ट और इकोनॉमिक इंटीग्रेशन सीमित हो सकता है। अगर भारत की अपनी नीतियां भी ज्यादा प्रोटेक्शनिस्ट दिखीं, तो यह ट्रेडिंग पार्टनर्स के निशाने पर आ सकती हैं।
भविष्य की राह
भारत को एक बड़ी ग्लोबल इकोनॉमी बनने के लिए अपनी नीतियों को इस बदलते माहौल में सावधानी से चलाना होगा। एनालिस्ट्स का मानना है कि डोमेस्टिक डिमांड भले ही मजबूत हो, लेकिन 7%-प्लस ग्रोथ की रफ्तार बनाए रखने के लिए इंटरनेशनल ट्रेड और जियोपॉलिटिकल शिफट्स को संभालना अहम होगा।
