विकास और समृद्धि के बीच बढ़ती खाई
FY26 में 7.7% की वृद्धि, जो FY24 के 7.2% से एक बड़ी छलांग है, वो समग्र आंकड़ों के पीछे छिपी अर्थव्यवस्था की अंदरूनी दिक्कत को दर्शाती है। इस तेज़ी का बड़ा हिस्सा कैपिटल-इंटेंसिव सर्विस और हाई-एंड मैन्युफैक्चरिंग की ओर झुका हुआ है, जो ज़्यादा प्रोडक्टिविटी तो देते हैं लेकिन रोज़गार कम पैदा करते हैं। जब इसे आम आदमी की जेब के हिसाब से देखें, तो प्रति व्यक्ति 'प्राइवेट फाइनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर' (Private Final Consumption Expenditure) कुल उत्पादन के मुकाबले पिछड़ रहा है। इससे पता चलता है कि आर्थिक लाभ कुछ ही लोगों तक सीमित है।
बाहरी दबाव के बीच औद्योगिक मजबूती
मैन्युफैक्चरिंग में 10.7% की वृद्धि वैश्विक व्यापार संरक्षणवाद (Global Trade Protectionism) और बदलती सप्लाई चेन (Supply Chain) के बीच एक बड़ी जीत है। पिछली बार की तरह नहीं, जब घरेलू औद्योगिक उत्पादन कमोडिटी की कीमतों के उतार-चढ़ाव से ज़्यादा प्रभावित होता था, इस बार वैल्यू-ऐडेड प्रोडक्शन (Value-Added Production) पर ज़ोर है। हालांकि, फाइनेंशियल सर्विसेज (Financial Services) और आईटी (IT) जैसे हाई-वैल्यू सेक्टर पर निर्भरता इसे सीमित बनाती है। अगर इन सेक्टरों में गिरावट आती है, तो कमज़ोर लेबर-इंटेंसिव इंडस्ट्रीज़ (Labor-Intensive Industries) एक बड़ी संरचनात्मक कमजोरी बन सकती है।
क्रेडिट की कमी और कंस्ट्रक्शन का धीमापन
कंस्ट्रक्शन में फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन (Fixed Capital Formation) धीमा पड़ने लगा है, जो सेमी-स्किल्ड रोज़गार (Semi-skilled Employment) में गिरावट का संकेत है। साथ ही, माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) का फॉर्मल क्रेडिट साइकिल (Formal Credit Cycle) में शामिल न हो पाना, संभावित उत्पादन को रोक रहा है। बैंक छोटी कंपनियों को कर्ज़ देने में बहुत सतर्क हैं और कॉरपोरेट बैलेंस शीट (Corporate Balance Sheet) को ज़्यादा सुरक्षित मान रहे हैं। वित्तीय क्षेत्र की यह 'लिक्विडिटी होर्डिंग' (Liquidity Hoarding) मैन्युफैक्चरिंग मल्टीप्लायर (Manufacturing Multiplier) को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचा रही है, जिससे छोटे पैमाने के उद्योग वर्तमान आर्थिक चक्र का पूरा फायदा नहीं उठा पा रहे हैं।
क्षेत्रीय और आर्थिक बिखराव का खतरा
दीर्घकालिक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा आर्थिक गतिविधियों का बढ़ता केंद्रीकरण है। पश्चिमी राज्य पूर्वी राज्यों की तुलना में जीडीपी (GDP) का ज़्यादा हिस्सा हासिल कर रहे हैं, जिससे भौगोलिक असंतुलन और स्थायी 'अंडरक्लास' (Underclass) का खतरा पैदा हो रहा है। मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि अगर कुल जीडीपी (GDP) और प्रति व्यक्ति आय वृद्धि के बीच का अंतर कम नहीं हुआ, तो देश 'कंजम्पशन क्लिफ' (Consumption Cliff) का सामना कर सकता है। वर्तमान विकास मॉडल का व्यापक घरेलू आय में तब्दील न हो पाना, इस बात का संकेत है कि सरकारी आंकड़े आम नागरिक की आर्थिक स्थिति की असलियत को बढ़ा-चढ़ाकर बता सकते हैं।
