भारत की आर्थिक उड़ान: 2027 तक तीसरी बड़ी इकोनॉमी बनने का लक्ष्य
यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य देश की मजबूत ग्रोथ रेट पर टिका है, जो लगातार ग्लोबल एवरेज से बेहतर रहने की उम्मीद है। इस आर्थिक विस्तार का बड़ा श्रेय देश की तगड़ी डोमेस्टिक डिमांड, बड़े पैमाने पर इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और तेजी से बढ़ते मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को जाता है। कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्टर पीयूष गोयल का यह बयान आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक, गोल्डमैन सैक्स और मॉर्गन स्टेनली जैसे बड़े फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स के अनुमानों से मेल खाता है। ये सभी संस्थाएं भारत की जीडीपी ग्रोथ को 2027 तक लगातार 6% से ऊपर रहने का अनुमान लगा रही हैं। इस ग्रोथ के दम पर भारत 2026 तक जर्मनी और जापान जैसी बड़ी इकोनॉमी को पीछे छोड़ देगा और 2027 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। अनुमान है कि 2026 तक भारत की नॉमिनल जीडीपी $4.19 ट्रिलियन तक पहुंच सकती है। वहीं, 2047 तक $30–35 ट्रिलियन की इकोनॉमी बनाने का लॉन्ग-टर्म लक्ष्य डोमेस्टिक कंजम्पशन (जो जीडीपी का लगभग 70% है) और क्लीन एनर्जी में 500 GW क्षमता ( 2030 तक) जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भारी इन्वेस्टमेंट से प्रेरित है।
ग्लोबल स्टेज पर भारत की पोजीशन और ट्रेड डील्स
भारत की अनुमानित ग्रोथ रेट अमेरिका, चीन और यूरोप की बड़ी इकोनॉमी से काफी आगे है। 2026 तक भारत की जीडीपी करीब 6.2-6.5% बढ़ सकती है, जबकि चीन की ग्रोथ 4.5-4.8%, अमेरिका की 1.8-2.4% और यूरोप की ग्रोथ इससे भी धीमी रहने का अनुमान है। इसका मतलब है कि भारत ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ में एक बड़ी हिस्सेदारी रखेगा। 2026 में ग्लोबल ग्रोथ में भारत का योगदान 17% रहने की उम्मीद है, जो चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा योगदान होगा।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले चार सालों में 9 ट्रेड एग्रीमेंट्स साइन हुए हैं, लेकिन इनका असर मिला-जुला रहा है। स्टडीज बताती हैं कि फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (एफटीए) से कुल ट्रेड वॉल्यूम तो बढ़ सकता है, लेकिन कई बार इम्पोर्ट्स पर ज्यादा असर होता है। आईटी और सर्विसेज सेक्टर ने इसका फायदा उठाया है, लेकिन खेती जैसे पारंपरिक सेक्टर्स को इम्पोर्ट्स से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा है।
⚠️ पर 'हिडन' रिस्क: क्या ग्रोथ ट्रैक पर रहेगी?
अच्छे अनुमानों के बावजूद, कुछ बड़ी चुनौतियां भारत की आर्थिक उड़ान में रुकावट डाल सकती हैं। सबसे बड़ी चिंता है कि अमेरिका की तरफ से बढ़ता प्रोटेक्शनइज्म और टैरिफ ( tariffs) से एक्सपोर्ट की डिमांड कम हो सकती है। ग्लोबल ट्रेड का माहौल भी काफी वोलेटाइल है और ट्रेड वॉर (trade war) ग्लोबल ग्रोथ को धीमा कर सकती है।
घरेलू मोर्चे पर, कॉर्पोरेट प्रॉफिट तो बढ़ा है, लेकिन प्राइवेट इन्वेस्टमेंट (private investment) में खास तेजी नहीं आई है, जो लॉन्ग-टर्म ग्रोथ के लिए चिंता का विषय है। अर्बन कंज्यूमर डिमांड भी थोड़ी सुस्त है और हाउसहोल्ड डेट (household debt) का स्तर भी एक चुनौती बना हुआ है। खेती-बाड़ी मॉनसून पर निर्भर है, जिससे वोलेटिलिटी बनी रहती है। अगर प्राइवेट इन्वेस्टमेंट में तेजी नहीं आई या ग्लोबल डिमांड कमजोर हुई तो यह अनुमान नीचे जा सकते हैं। केवल डोमेस्टिक डिमांड पर निर्भर रहना भी अर्थव्यवस्था को अंदरूनी झटकों के प्रति संवेदनशील बना सकता है।
भविष्य की राह: पॉजिटिव लेकिन सावधान
कुल मिलाकर, एनालिस्ट्स (analysts) भारत के इकोनॉमिक आउटलुक को लेकर पॉजिटिव हैं, लेकिन कुछ शर्तों के साथ। उनका मानना है कि भारत सबसे तेजी से बढ़ने वाली मेजर इकोनॉमी बना रहेगा, जिसकी ग्रोथ 6% से ऊपर रहेगी। हालांकि, इस सफलता के लिए बाहरी जोखिमों को संभालना और डोमेस्टिक प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा देना जरूरी होगा।
आईएमएफ (IMF) का अनुमान है कि 2025-26 में भारत की ग्रोथ 6.6% रहेगी, लेकिन 2026-27 तक यह घटकर 6.2% हो सकती है, जिसका कारण ग्लोबल डिमांड में कमी और अमेरिकी टैरिफ का असर हो सकता है। फिच (Fitch) ने 2027 फाइनेंशियल ईयर के लिए 6.3% ग्रोथ का अनुमान लगाया है। मार्केट इन अनुमानों पर ग्लोबल ट्रेड रिलेशंस और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट में रिकवरी के संकेतों पर बारीकी से नजर रखेगा।