16वें वित्त आयोग का बड़ा फैसला: राज्यों के फंड का बंटवारा बदलेगा, अब GDP में योगदान सबसे अहम!

ECONOMY
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AuthorMehul Desai|Published at:
16वें वित्त आयोग का बड़ा फैसला: राज्यों के फंड का बंटवारा बदलेगा, अब GDP में योगदान सबसे अहम!
Overview

भारत के 16वें वित्त आयोग (16th Finance Commission) ने राज्यों को मिलने वाले फंड (fiscal devolution) के फॉर्मूले में बड़ा बदलाव किया है। आयोग ने सिफारिश की है कि अब राज्यों का राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान उनके हिस्से का मुख्य आधार बनेगा, जिससे पैसों के बंटवारे का तरीका बदल जाएगा।

इकोनॉमिक एफिशिएंसी को मिलेगी तरजीह

16वें वित्त आयोग की नई सिफारिशें केंद्र सरकार से राज्यों को फंड बांटने के तरीके में एक बड़ी रणनीतिक दिशा बदलने का संकेत देती हैं। आयोग ने राज्यों के बीच फंड के बंटवारे में 'आर्थिक उत्पादकता' यानी इकोनॉमिक एफिशिएंसी को सबसे अहमियत देने का फैसला किया है। इसके तहत, पहली बार किसी राज्य के राष्ट्रीय जीडीपी (GDP) में सीधे योगदान को 10% का वेटेज (महत्व) दिया जाएगा। यह कदम पिछले मॉडलों से एक बड़ा बदलाव है, जो अक्सर जनसंख्या जैसे जनसांख्यिकीय कारकों पर ज़्यादा निर्भर करते थे। इस नए नियम का मकसद राज्यों को इकोनॉमिक आउटपुट में कुशलता दिखाने और उसे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना है, और यह राष्ट्रीय आर्थिक विकास के लक्ष्यों के साथ फंड के आवंटन को बेहतर ढंग से जोड़ेगा।

फॉर्मूले में बड़े उलटफेर और राज्यों पर असर

फेडरल डिवोल्यूशन (केंद्र से राज्यों को मिलने वाले कुल फंड का हिस्सा) जहां 41% पर स्थिर है, वहीं राज्यों के बीच फंड के बंटवारे (horizontal devolution) के फॉर्मूले में कई अहम बदलाव किए गए हैं। 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों की तुलना में, राज्यों की 2011 की जनसंख्या के हिसाब से वेटेज को 15% से बढ़ाकर 17.5% कर दिया गया है। दूसरी ओर, राज्य के भौगोलिक क्षेत्रफल (Area) का वेटेज 15% से घटाकर 10% कर दिया गया है। वहीं, इनकम डिस्टेंस (राज्यों की प्रति व्यक्ति आय और सबसे अमीर तीन राज्यों की औसत आय के बीच का अंतर) जैसे 'इक्वलाइजिंग पैरामीटर' का वेटेज 45% से थोड़ा कम होकर 42.5% हो गया है।

जनसांख्यिकीय प्रदर्शन (Demographic Performance) को लेकर भी बड़ा बदलाव हुआ है। पहले जहाँ टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) के आधार पर यह तय होता था, वहीं अब 1971 से 2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि दर को आधार बनाया जाएगा, जिसका वेटेज 12.5% से घटाकर 10% कर दिया गया है। यह उन राज्यों के लिए राहत है जिन्होंने अपनी आबादी को स्थिर कर लिया है, लेकिन इससे वर्कफोर्स में बढ़त को लेकर कुछ चुनौतियां आ सकती हैं। इसके अलावा, 2.5% का टैक्स एफर्ट (Tax Effort) पैरामीटर हटा दिया गया है और उसकी जगह जीएसडीपी (GSDP) के वर्गमूल (square root) के आधार पर जीडीपी योगदान का नया पैरामीटर शामिल किया गया है। पर्यावरणीय मापदंड (Environmental Parameter) में वन क्षेत्र (Forest Cover) के साथ-साथ खुले वन क्षेत्रों को भी शामिल किया गया है, और 2015 से 2023 के बीच वन क्षेत्र में हुई वृद्धि को भी पुरस्कृत किया जाएगा। इन बदलावों से उम्मीद की जा रही है कि दक्षिणी राज्यों, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों को अधिक फंड मिल सकता है। वहीं, हिंदी पट्टी के ज़्यादातर राज्य, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और कुछ पूर्वोत्तर राज्यों को फंड में मामूली कमी का सामना करना पड़ सकता है।

फिस्कल सस्टेनेबिलिटी पर चिंता और नीतिगत खालीपन

वित्त आयोग ने राज्यों द्वारा अंधाधुंध तरीके से बांटे जा रहे 'फ्रीबीज' (Freebies) या बिना शर्त नकद हस्तांतरण (unconditional cash transfers) जैसे फिस्कली अनसस्टेनेबल सब्सिडीज के बढ़ते बोझ को लेकर चिंता जताई है। रिपोर्ट में इन पर बेहतर टारगेटिंग और युक्तिकरण (rationalization) की सलाह दी गई है, लेकिन सख्त कदम उठाने से परहेज किया गया है। सबसे अहम बात यह है कि 16वें वित्त आयोग ने पिछले आयोगों द्वारा पुरजोर तरीके से स्वतंत्र फिस्कल काउंसिल (Independent Fiscal Council) बनाने की सिफारिश को अपनी रिपोर्ट में शामिल नहीं किया है। जानकारों के बीच इस पर मिली-जुली राय है। कुछ का मानना है कि इससे राज्यों को अपनी वित्तीय प्रबंधन में ज़्यादा लचीलापन मिलेगा, जबकि कुछ की चिंता है कि यह वित्तीय अनुशासन पर ढीली पकड़ का संकेत हो सकता है, जो आगे चलकर राज्यों को और ज़्यादा लोकलुभावन खर्चों के लिए प्रोत्साहित कर सकता है और वित्तीय घाटे को बढ़ा सकता है।

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