आज, 18 मई 2026 को भारतीय शेयर बाजारों ने गिरावट के साथ कारोबार की शुरुआत की। शुरुआती कारोबार में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का सेंसेक्स 833.20 अंकों की भारी गिरावट के साथ 74,404.79 पर आ गया, वहीं नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी 50 भी 234 अंक लुढ़ककर 23,401.70 पर पहुंच गया। इस तेज गिरावट के पीछे वैश्विक और घरेलू दबावों का एक मिला-जुला असर रहा।
मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव के बढ़ने से चिंताएं गहरा गईं, खासकर जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर नई चेतावनियां जारी कीं। इससे सप्लाई बाधित होने का डर पैदा हो गया, विशेषकर होर्मुज जलडमरूमध्य के पास। इसी कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की कीमतें $110 प्रति बैरल के पार चली गईं, जिससे महंगाई (Inflation) बढ़ने की आशंकाएं और तेज हो गईं।
इस दबाव को और बढ़ाने का काम भारतीय रुपये ने किया, जो अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 96.17 के करीब पहुंच गया। रुपये के कमजोर होने से आयात लागत बढ़ी और निवेशकों का भरोसा डगमगा गया।
बाजार के ज्यादातर सेक्टोरल इंडेक्स में गिरावट देखी गई, हालांकि निफ्टी IT सेक्टर कुछ मामूली बढ़त दर्ज कराने में कामयाब रहा।
बाजार की यह तेज गिरावट वैश्विक जोखिमों के प्रति बढ़ी हुई संवेदनशीलता को दर्शाती है। भारतीय शेयर बाजारों ने अन्य एशियाई बाजारों में आई गिरावट को भी दर्शाया, जहां दक्षिण कोरिया का कोस्पी (Kospi) 3% से अधिक और जापान का निक्केई (Nikkei) 200 अंकों से अधिक गिरा, जो जोखिम से बचने की एक क्षेत्रीय प्रवृत्ति का संकेत देता है।
कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के लिए एक बड़ी चुनौती हैं, क्योंकि देश अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। इससे देश के आयात-निर्यात संतुलन और महंगाई दर पर नकारात्मक असर पड़ता है। अप्रैल 2026 में खुदरा महंगाई दर पहले ही 3.48% थी, जिसमें खाद्य महंगाई 4.20% थी। तेल की मौजूदा कीमतों में उछाल से इन आंकड़ों के और बढ़ने की उम्मीद है, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए मौद्रिक नीति (Monetary Policy) को नियंत्रित करना और मुश्किल हो सकता है।
गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) जैसी ब्रोकरेज फर्मों ने लगातार महंगाई के जोखिमों को देखते हुए 2026 में ब्याज दरों में दो बार बढ़ोतरी की भविष्यवाणी की है। ऐतिहासिक रूप से, भू-राजनीतिक अस्थिरता ने भारत में बड़े बाजार उतार-चढ़ाव को जन्म दिया है, और अक्सर विदेशी निवेशकों द्वारा बिकवाली (Selling) बढ़ी है। मई 2026 में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी से ₹27,048 करोड़ निकाले हैं, जो इस साल अब तक ₹2.2 लाख करोड़ के कुल बहिर्वाह (Outflow) का हिस्सा है, जिसने पहले भी बाजार पर दबाव बनाया है।
तकनीकी विश्लेषण (Technical Analysis) भी सावधानी बरतने का संकेत दे रहा है। निफ्टी 23,800-24,000 के स्तर पर प्रतिरोध (Resistance) और 23,200-23,000 पर सपोर्ट का सामना कर रहा है, जो अस्थिर और दायरे में कारोबार की संभावना को इंगित करता है।
वर्तमान बाजार महत्वपूर्ण जोखिमों का सामना कर रहा है। मुख्य चिंता मध्य पूर्व में किसी लंबे भू-राजनीतिक संघर्ष की है, जो तेल की आपूर्ति को और बाधित कर सकता है, जिससे ऊर्जा की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहेंगी और महंगाई का चक्र और बिगड़ेगा। कमजोर रुपये के साथ मिलकर, यह भारत की आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए एक कठिन स्थिति पैदा करता है, जिससे धीमी वृद्धि के साथ उच्च महंगाई का डर बढ़ जाता है। इस साल विदेशी निवेशकों द्वारा बड़ी बिकवाली विश्वास की कमी को दर्शाती है, क्योंकि वे वैश्विक अनिश्चितताओं और बढ़ती अमेरिकी ब्याज दरों के बीच सुरक्षित संपत्तियों की ओर पैसा ले जा रहे होंगे। तेल की कीमतों और वैश्विक ब्याज दरों के अंतर से प्रेरित रुपये की कमजोरी जारी रह सकती है, जिससे क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम हो सकती है और आयात लागत बढ़ सकती है।
रियलटी (Realty), ऑटो (Auto) और पीएसयू बैंक्स (PSU Banks) जैसे सेक्टर्स के नेतृत्व में व्यापक बाजार बिकवाली, जोखिम से बचने की भावना को दर्शाती है। यदि निफ्टी महत्वपूर्ण सपोर्ट स्तरों को बनाए रखने में विफल रहता है, तो विश्लेषकों ने आगे और गिरावट की चेतावनी दी है।
बाजार सहभागियों को लगातार अस्थिरता और सावधानी की उम्मीद है। विश्लेषकों का अनुमान है कि निफ्टी निकट भविष्य में 23,000 और 24,000 के बीच कारोबार कर सकता है। मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज (Motilal Oswal Financial Services) के रिसर्च हेड सिद्धार्थ खेमका (Siddhartha Khemka) ने नोट किया कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, कमजोर रुपया और विदेशी निवेशकों के प्रवाह में उतार-चढ़ाव बाजार की धारणा को सुस्त रखेंगे। फार्मास्युटिकल स्टॉक (Pharmaceutical Stocks) को उनकी निर्यात ताकत और स्थिर घरेलू मांग के कारण संभावित रक्षात्मक निवेश (Defensive Investments) के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि कमाई का सीजन (Earnings Season) जारी है, भू-राजनीतिक घटनाएं और कमोडिटी की कीमतें आने वाले हफ्तों में बाजार को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक बने रहेंगे। आरबी आई (RBI) बारीकी से नजर रख रहा है, महंगाई संबंधी चिंताओं को आर्थिक विकास के साथ संतुलित कर रहा है, लेकिन कीमतों में लगातार वृद्धि अपेक्षित ब्याज दर में किसी भी संभावित कटौती को टाल सकती है।