कच्चे तेल का 'प्रेशर' और मिडिल ईस्ट का 'टेंशन'
मंगलवार को भारतीय बाजार में बिकवाली का बड़ा दौर चला। पहले के उत्साह पर उस वक्त पानी फिर गया जब मध्य पूर्व (Middle East) में भू-राजनीतिक जोखिम (geopolitical risks) बढ़ गए। इससे ग्लोबल एनर्जी की कीमतों में आग लग गई और निवेशकों ने जोखिम लेने से परहेज करना शुरू कर दिया। इस गिरावट का सबसे बड़ा ट्रिगर वेस्ट एशिया में बढ़ता तनाव रहा, जिसके चलते ब्रेंट क्रूड (Brent crude) की कीमत 1.48% बढ़कर $111.4 प्रति बैरल तक पहुंच गई। भारत अपनी तेल की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में कीमतों में यह बढ़ोतरी देश की आर्थिक स्थिरता के लिए सीधा खतरा है। बढ़ी हुई ऊर्जा लागत का मतलब है महंगाई का दबाव, जिससे फिस्कल डेफिसिट (fiscal deficit) बढ़ सकता है और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी (monetary policy) पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे हालात में निवेशक अक्सर इक्विटी मार्केट्स (equity markets) में बिकवाली शुरू कर देते हैं।
विदेशी निवेशकों (FIIs) की निकासी ने बढ़ाया दबाव
बाजार की परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई। फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) ने सोमवार को भी ₹8,167.17 करोड़ के शेयर बेचे। यह लगातार बिकवाली वैश्विक निवेशकों के बड़े जोखिमों और संभावित आर्थिक मंदी को लेकर सतर्क होने का संकेत देती है। ऐसे में पूंजी का देश से बाहर जाना रुपये पर दबाव डाल सकता है और घरेलू बाजार की सेंटीमेंट को और खराब कर सकता है। हालांकि, डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) ने ₹8,088.70 करोड़ के शेयर खरीदकर कुछ हद तक सहारा दिया, लेकिन यह FIIs की बिकवाली की भरपाई करने के लिए काफी नहीं था।
टेक स्टॉक्स बने 'सेफ हेवन'
जहां बड़े मार्केट इंडेक्स (market indices) में गिरावट आई, वहीं टेक महिंद्रा (Tech Mahindra), एचसीएल टेक्नोलॉजीज (HCL Technologies), बजाज फाइनेंस (Bajaj Finance) और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) जैसे टेक्नोलॉजी स्टॉक्स में अच्छी तेजी देखने को मिली। यह दिखाता है कि IT सेक्टर को वैश्विक ग्राहकों के चलते और कमोडिटी की कीमतों के सीधे असर से दूर होने के कारण एक सुरक्षित ठिकाना (safer haven) माना जा रहा है। एचसीएल टेक्नोलॉजीज का P/E रेश्यो (P/E ratio) करीब 21.1 है, जबकि TCS का P/E रेश्यो लगभग 17.8 है। टेक महिंद्रा का P/E रेश्यो 30.9 के आसपास है, और बजाज फाइनेंस का 29.07 के करीब है। ये वैल्यूएशन्स (valuations) बताते हैं कि मौजूदा अनिश्चितता में, टेक्नोलॉजी कंपनियों की कमाई की क्षमता को बेहतर माना जा रहा है।
क्षेत्रीय बाजारों में मिली-जुली तस्वीर
एशियाई बाजारों का हाल भी मिला-जुला रहा। साउथ कोरिया का कोस्पी (Kospi) और शंघाई कंपोजिट (Shanghai Composite) तेजी में थे, जबकि जापान का निक्केई 225 (Nikkei 225) नीचे आया। इससे पता चलता है कि भारत पर जो नकारात्मक सेंटीमेंट हावी है, वह सिर्फ घरेलू नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक चिंताओं से भी प्रभावित है। पिछले 6 महीनों में निफ्टी 50 (Nifty 50) में करीब 8.92% की गिरावट आई है, जो एक व्यापक ट्रेंड की ओर इशारा करता है।
वैल्यूएशन और मार्जिन पर दबाव की चिंता
फिलहाल निफ्टी 50 का P/E रेश्यो लगभग 20.3 है, जो बताता है कि यह वैल्यूएशन थोड़ा नाजुक हो सकता है, खासकर अगर कमाई की ग्रोथ धीमी पड़ी। लगातार भू-राजनीतिक अस्थिरता का मतलब है तेल जैसे आयात बिलों का बढ़ना, जो विभिन्न सेक्टर्स में कंपनियों के मार्जिन को दबा सकता है। इंटरग्लोब एविएशन (InterGlobe Aviation) जैसी कंपनियां बढ़ी हुई फ्यूल कॉस्ट (fuel cost) और यात्रा की मांग में संभावित रुकावटों से खास तौर पर प्रभावित हो सकती हैं। इसी तरह, एक्सिस बैंक (Axis Bank) (P/E ~14.73) और एसबीआई (SBI) (P/E ~10.5) जैसे बैंकिंग स्टॉक्स, जो अधिक डिफेन्सिव वैल्यूएशन दिखाते हैं, धीमी आर्थिक ग्रोथ और बढ़ते नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (non-performing assets) के कारण मुश्किलों का सामना कर सकते हैं।
निवेशक का भरोसा और रेगुलेटरी वॉच
FIIs की लगातार बिकवाली से ग्लोबल कैपिटल एलोकेटर्स (capital allocators) के भरोसे में कमी का पता चलता है, शायद इसलिए कि उन्हें संभावित रिटर्न से ज्यादा जोखिम दिख रहा है। RBI जैसी नियामक संस्थाएं महंगाई और ग्रोथ की गति पर लगातार नजर रख रही हैं; अगर इकोनॉमिक ट्रैजेक्टरी (economic trajectories) में कोई भी बदलाव आता है, तो पॉलिसी रिस्पॉन्स (policy responses) बाजार को और प्रभावित कर सकते हैं। RBI की ब्याज दरों को लेकर दी गई गाइडेंस पर फोकस इस संवेदनशीलता को दर्शाता है।
आगे का रास्ता भू-राजनीतिक शांति पर निर्भर
विश्लेषक मध्य पूर्व में बातचीत की स्थिति पर नजर रखे हुए हैं, और उनका मानना है कि ईरान की शर्तें भू-राजनीतिक जोखिम को बढ़ाए हुए हैं। बर्न्सटाईन (Bernstein) ने हाल ही में मध्य पूर्व में लंबे समय तक चलने वाले तनाव और संभावित स्टैगफ्लेशनरी प्रेशर (stagflationary pressures) की चिंताओं को देखते हुए अपने साल के अंत के निफ्टी टारगेट (Nifty target) को 28,100 से घटाकर 26,000 कर दिया है। बाजार की आगे की चाल इस बात पर निर्भर करेगी कि मध्य पूर्व में तनाव कितना कम होता है, कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होती हैं या नहीं, और घरेलू पूंजी का प्रवाह जारी रहता है या नहीं। अगर भू-राजनीतिक स्थिरता और बिगड़ती है, तो बाजार में और गिरावट आ सकती है, वहीं कोई तेजी से समाधान निकलने पर खरीदारों में उत्साह दिख सकता है।