यूरोपीय संघ (EU) के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) नियमों के चलते भारतीय स्टील सेक्टर पर दबाव बढ़ गया है। कंपनियों को अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करना होगा ताकि वे ग्लोबल मार्केट में, खासकर यूरोप में, अपनी एक्सपोर्ट को बनाए रख सकें। हालांकि, **163.7 मिलियन टन (MT)** की मजबूत डोमेस्टिक डिमांड इंडस्ट्री को सहारा दे रही है, लेकिन भविष्य के लिए प्रोडक्शन को मॉडर्न बनाना ज़रूरी हो गया है।
Detailed Coverage
ग्लोबल ट्रेड में एन्वॉयरन्मेंट का बढ़ता दखल
भारतीय स्टील इंडस्ट्री एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। अब ग्लोबल ट्रेड में सिर्फ कीमत और क्वालिटी ही नहीं, बल्कि प्रोडक्शन के एन्वॉयरन्मेंटल इम्पैक्ट को भी अहमियत दी जा रही है। यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे नियम लागू होने से भारतीय स्टील प्रोड्यूसर्स पर कार्बन फुटप्रिंट घटाने का दबाव बढ़ गया है। स्टील मिनिस्ट्री के इकोनॉमिक एडवाइजर, अश्विनी कुमार का कहना है कि अगर कंपनियों ने अपने प्रोडक्शन प्रोसेस को जल्दी मॉडर्न नहीं किया, तो मौजूदा कार्बन इंटेंसिटी लेवल्स एक्सपोर्टर्स के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं।
डोमेस्टिक डिमांड का सहारा
अच्छी बात यह है कि दुनिया के कई देशों के उलट, भारत का डोमेस्टिक स्टील मार्केट मजबूत बना हुआ है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में, डोमेस्टिक स्टील की खपत 163.7 मिलियन टन (MT) रही, जो देश के 162 MT के फिनिश्ड स्टील प्रोडक्शन के करीब है। इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, शहरीकरण और ऑटोमोटिव व कंज्यूमर ड्यूरेबल्स से मिल रही डिमांड, लोकल स्टीलमेकर्स के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर रही है। भारत में प्रति व्यक्ति स्टील की खपत 110 किलोग्राम है, जबकि ग्लोबल एवरेज 425 किलोग्राम है। ऐसे में, डोमेस्टिक मार्केट में ग्रोथ की काफी गुंजाइश है।
मॉडर्नाइजेशन की स्ट्रेटेजिक प्रायोरिटीज
ग्लोबल ट्रेड में आ रहे इन बदलावों से निपटने के लिए, स्टील मिनिस्ट्री ने कई अहम बदलावों की पहचान की है। उत्सर्जन कम करने के अलावा, सरकार कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग सिस्टम पर भी फोकस कर रही है। इसके लिए कंपनियों को अपने कार्बन की गणना और रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड्स को बेहतर बनाना होगा। साथ ही, लॉन्ग-टर्म रॉ मटेरियल सप्लाई सिक्योर करना और मैन्युफैक्चरिंग एफिशिएंसी को बढ़ाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) जैसी डिजिटल टेक्नोलॉजीज को अपनाना भी बाकी प्रायोरिटीज में शामिल है।
ग्लोबल ट्रेड की चुनौतियाँ
फिलहाल डोमेस्टिक डिमांड से इंडस्ट्री को राहत मिली हुई है, लेकिन ग्रीन स्टील प्रोडक्शन की ओर बढ़ना काफी कैपिटल इंटेंसिव होगा। प्रोड्यूसर्स को पुराने, ज्यादा एमिशन वाले तरीकों को बदलने के लिए नई टेक्नोलॉजीज में भारी निवेश करना होगा। इन्वेस्टर्स के लिए यह देखना ज़रूरी होगा कि भारतीय स्टील कंपनियां इन खर्चों को मैनेज करते हुए अपने प्रॉफिट मार्जिन को कैसे बनाए रखती हैं। ग्लोबल एन्वॉयरन्मेंटल स्टैंडर्ड्स को पूरा न कर पाने का रिस्क यह है कि ट्रेड कॉस्ट बढ़ सकती है या प्रीमियम इंटरनेशनल मार्केट्स तक पहुंच सीमित हो सकती है। इन्वेस्टर्स इस पर भी नजर रख सकते हैं कि अलग-अलग कंपनियां एनर्जी-एफिशिएंट इक्विपमेंट में कितना पैसा लगा रही हैं और क्या इन निवेशों का आने वाली तिमाही की रिपोर्टिंग में प्रोडक्शन कॉस्ट पर कोई खास असर दिख रहा है।
