भू-राजनीतिक तनाव और रुपये पर असर
सबसे पहले, बात करते हैं सबसे बड़े खतरे की। ईरान में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं (emerging market currencies) पर दिख रहा है, और भारतीय रुपया भी इससे अछूता नहीं है। मार्च से अप्रैल 2026 के बीच, रुपये में 4% की गिरावट दर्ज की गई। एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि 2026 के अंत तक यह US डॉलर के मुकाबले ₹95 के स्तर तक जा सकता है। ऐतिहासिक तौर पर, जब भी रुपये पर दबाव बढ़ा है, RBI ने मार्केट में दखल देकर इसे संभाला है। RBI के पास फिलहाल $698.49 बिलियन का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो पिछले साल की तुलना में थोड़ा कम जरूर हुआ है, लेकिन यह अभी भी बड़े हस्तक्षेप (intervention) के लिए काफी मजबूत माना जा रहा है।
विदेशों से आने वाला पैसा और बाहर जाने वाला धन
ईरान संघर्ष का एक और बड़ा असर खाड़ी देशों (Gulf countries) से भारत आने वाले पैसे, यानी रेमिटेंस (remittances) पर भी पड़ सकता है। भारत के कुल रेमिटेंस का लगभग 38% इन्हीं देशों से आता है, जो देश की GDP में करीब 1% का योगदान देता है। अगर इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित होती हैं, तो इसका सीधा असर भारत के ट्रेड डेफिसिट (trade deficit) पर पड़ेगा। 2025 में भारत को रिकॉर्ड $135 बिलियन रेमिटेंस मिले थे, जिनमें से करीब 40% GCC देशों से थे। इसके अलावा, वैश्विक अनिश्चितता (global uncertainty) के चलते विदेशी निवेशक (investors) भारत जैसे उभरते बाजारों से अपना पैसा निकाल रहे हैं। मार्च 2026 में ही भारत से $13.4 बिलियन का कैपिटल आउटफ्लो (capital outflows) देखा गया, जो महामारी के बाद सबसे बड़ा मासिक आंकड़ा है।
पिछली चुनौतियां और साथियों का प्रदर्शन
पिछले साल रुपये में आई 10% की गिरावट वैसी ही चुनौती दिखाती है जैसी जनवरी 2022 से दिसंबर 2022 के बीच देखी गई थी, जब अमेरिका के ब्याज दरें (US dollar interest rates) बढ़ने से डॉलर मजबूत हुआ था। तब RBI को अपना विदेशी मुद्रा भंडार 13% कम करना पड़ा था। हालांकि, आज भंडार की मात्रा अधिक है। वहीं, दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की बात करें तो 2025 में मैक्सिकन पेसो (Mexican peso) और साउथ अफ्रीकी रैंड (South African rand) जैसी करेंसी मजबूत हुईं, जबकि रुपये में 4.8% की गिरावट आई। MSCI इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स (MSCI Emerging Markets Index) भी वैश्विक घटनाओं से प्रभावित रहा है।
रुपये के लिए बाकी जोखिम
हालांकि RBI का भंडार और मार्केट में दखल देने की क्षमता रुपये को सहारा दे रही है, लेकिन स्थिति पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। सबसे बड़ा खतरा भू-राजनीतिक झटकों (geopolitical shocks) और उनके अप्रत्यक्ष असर से है। ईरान संघर्ष ऊर्जा आपूर्ति में बाधा डाल सकता है और खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान पहुंचाकर रेमिटेंस में 30% तक की कमी ला सकता है। इससे न केवल ट्रेड डेफिसिट बढ़ेगा, बल्कि विदेशी मुद्रा का एक अहम जरिया भी सूख जाएगा। इसके अलावा, वैश्विक अनिश्चितता के चलते भारत में नए निवेश (new investments) कम रहने की आशंका है। RBI को रुपये को स्थिर रखने के लिए लगातार कदम उठाने पड़ रहे हैं, जैसा कि अप्रैल 2025 में $3.6 बिलियन की बिक्री से जाहिर हुआ था। फरवरी 2026 में जहां भंडार $728.49 बिलियन था, वहीं अप्रैल 2026 तक यह घटकर $698.49 बिलियन रह गया है, जो लगातार मार्केट में हस्तक्षेप को दिखाता है। अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है या वैश्विक निवेशक घबराते हैं, तो रुपया अचानक तेज गिरावट दिखा सकता है।
