रुपये में ऐतिहासिक गिरावट के पीछे की वजहें
भारतीय रुपये का डॉलर के मुकाबले 95.22 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने के पीछे कई ग्लोबल और घरेलू वजहें हैं। सबसे बड़ा कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों का $115 प्रति बैरल के पार जाना है। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण सप्लाई बाधित होने का डर है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल की बढ़ी कीमतें ट्रेड डेफिसिट को बढ़ाती हैं और आयात के लिए डॉलर की मांग को तेज करती हैं।
इसके साथ ही, ग्लोबल अनिश्चितता के बीच डॉलर इंडेक्स (DXY) 100 के ऊपर बना हुआ है, जो एक सेफ हेवन के तौर पर काम कर रहा है। यह भी रुपये पर दबाव बना रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों की फॉरेन एक्सचेंज पोजीशन को $100 मिलियन तक सीमित कर ऑयल इंपोर्टर्स के लिए डॉलर की उपलब्धता बढ़ाने की कोशिश की। हालांकि, यह उपाय केवल कुछ समय के लिए राहत दे सका, क्योंकि तेल खरीदारों की ओर से लगातार डॉलर की मांग ने इन कदमों के प्रभाव को जल्द ही खत्म कर दिया।
रुपये की चाल: कब क्या हुआ?
यह तेज गिरावट एक लंबे ट्रेंड का हिस्सा है। 28 फरवरी 2026 को पश्चिम एशिया में संघर्ष तेज होने के बाद से रुपया लगभग 4.1% कमजोर हुआ है, और पिछले एक साल में यह 11.09% लुढ़क गया है। यह मार्च 2026 में डॉलर के मुकाबले अपने ऑल-टाइम हाई पर था। ऐतिहासिक रूप से, भू-राजनीतिक तनाव के कारण भारत में रुपये में गिरावट आती है, जिसका मुख्य कारण तेल की ऊंची कीमतें और देश से कैपिटल का बाहर जाना है। उदाहरण के तौर पर, 1991 के खाड़ी युद्ध ने एक ऑयल शॉक के साथ गंभीर बैलेंस-ऑफ-पेमेंट्स संकट पैदा कर दिया था।
20 मार्च 2026 तक भारत का फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व करीब $698.35 अरब था, जो फरवरी 2026 में $700 अरब से थोड़ा कम है। हालांकि, यह रिजर्व लेवल महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका इस्तेमाल मार्केट इंटरवेंशन और बढ़ते आयात लागत को पूरा करने में हो रहा है, जिससे सेंट्रल बैंक की फ्लेक्सिबिलिटी कम हो रही है।
अन्य इमर्जिंग मार्केट करेंसीज की तुलना में रुपये का प्रदर्शन कमजोर रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि रुपया "पूरी तरह ठीक चल रहा है" और दक्षिण कोरियाई वोन, थाई बाहट और फिलीपीन पेसो जैसी करेंसी से बेहतर कर रहा है। लेकिन, हालिया आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक साल में रुपया 11.09% गिरा है, जिससे यह सबसे कमजोर इमर्जिंग मार्केट करेंसी में से एक बन गया है। कुछ विश्लेषकों के अनुसार, सिर्फ इस तिमाही में 5.1% की गिरावट आई है। नवंबर 2025 की एक जेफरीज (Jefferies) रिपोर्ट में रुपये को ईयर-टू-डेट आधार पर प्रमुख इमर्जिंग मार्केट करेंसीज में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला बताया गया था।
रुपये के सामने आने वाली चुनौतियां
ये मुद्दे मौजूदा भू-राजनीतिक घटनाओं से परे अंतर्निहित कमजोरियों को उजागर करते हैं। मजबूत अमेरिकी डॉलर, जो एक सेफ-हेवन एसेट है, रुपये की रिकवरी की संभावनाओं को सीमित कर रहा है। इसके अलावा, फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) की भारी बिकवाली एक बड़ी चुनौती पेश कर रही है। मार्च 2026 में FIIs ने लगभग ₹1.2 लाख करोड़ ($12 अरब) निकाले, जो भारतीय मार्केट के इतिहास में सबसे बड़ी मासिक बिकवाली थी। ग्लोबल अनिश्चितता और भारत में एनर्जी शॉक के कारण अर्निंग्स डाउनग्रेड के डर से उपजी यह सतर्कता यह बताती है कि लोकल उपाय केवल अल्पकालिक राहत दे सकते हैं। तेल आयात पर भारत की निर्भरता और करेंट अकाउंट डेफिसिट (हालांकि नवंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार यह हाल ही में GDP के 0.5% के 20 साल के निचले स्तर पर सुधरा था) अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील बनाते हैं।
Systematix Institutional Equities के विश्लेषकों का मानना है कि RBI के कदमों का स्थायी प्रभाव सीमित है। वे चेतावनी देते हैं कि यदि तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं तो USD/INR जल्द ही 100 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच सकता है।
रुपये का आउटलुक
रुपये के भविष्य की भविष्यवाणी करना मुश्किल है, और यह इस बात पर निर्भर करेगा कि मध्य-पूर्व के तनाव कैसे सुलझते हैं और तेल की कीमतें कैसे स्थिर होती हैं। कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि भारत के सुधरते इकोनॉमिक फंडामेंटल्स के कारण 2026 के मध्य तक यह 87-88 रुपये प्रति डॉलर तक मजबूत हो सकता है। वहीं, अन्य लोग लगातार कमजोरी की आशंका जता रहे हैं, और मौजूदा ग्लोबल अनिश्चितताओं को देखते हुए साल के अंत तक USD/INR 93-95 तक जा सकता है।
RBI और सरकार करेंसी की चाल पर बारीकी से नजर रख रही हैं। हालांकि, स्थायी मजबूती के लिए भू-राजनीतिक संघर्षों का अंत, स्थिर वैश्विक ऊर्जा बाजार और मजबूत घरेलू आर्थिक प्रदर्शन की आवश्यकता होगी।