भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर, पर DSP MF बोला - पैनिक करने की ज़रूरत नहीं!

ECONOMY
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AuthorNeha Patil|Published at:
भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर, पर DSP MF बोला - पैनिक करने की ज़रूरत नहीं!
Overview

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर पर गिर गया है, जिससे बाज़ार में चिंता का माहौल है। लेकिन, DSP म्यूचुअल फंड का मानना है कि यह घबराहट ज़रूरत से ज़्यादा है, क्योंकि उनका मानना है कि रुपया REER के हिसाब से अंडरवैल्यूड (undervalued) है। घटता हुआ इंफ्लेशन (inflation) गैप और विदेशी मुद्रा का मजबूत इनफ्लो (inflow) भारत की वित्तीय स्थिति को मज़बूत बना रहे हैं।

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रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर, बाज़ार में चिंता

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया एक अभूतपूर्व निचले स्तर पर आ गया है। 20 मई को रुपया 96.86 पर बंद हुआ, और इंट्रा-डे में यह 96.95 तक चला गया था। इस तेज़ गिरावट ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है, खासकर इंफ्लेशन (inflation) और आर्थिक स्थिरता को लेकर।

DSP MF: घबराहट ज़रूरत से ज़्यादा हो सकती है

बाज़ार की मौजूदा भावनाओं के विपरीत, DSP म्यूचुअल फंड का कहना है कि रुपये की गिरावट पर प्रतिक्रिया ज़रूरत से ज़्यादा हो सकती है। फंड हाउस के विश्लेषण से पता चलता है कि रुपया फंडामेंटली (fundamentally) अंडरवैल्यूड (undervalued) है। रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (REER) के आंकड़े ऐसे स्तर दिखा रहे हैं जो आमतौर पर बड़े वित्तीय संकटों के दौरान देखे जाते हैं। इसका मतलब यह है कि करेंसी की कमजोरी का एक बड़ा हिस्सा पहले ही मौजूदा भाव में शामिल हो चुका है, जिससे आगे की बड़ी गिरावट की गुंजाइश कम हो सकती है।

इंफ्लेशन (Inflation) में समानता से रुपये को सहारा

DSP MF के नज़रिये का एक अहम पहलू भारत और अमेरिका के बीच घटता हुआ इंफ्लेशन (inflation) का अंतर है। पिछले एक साल में भारत में इंफ्लेशन (inflation) औसतन 2.3% रहा है, जबकि अमेरिका में यह 2.8% रहा है। ऐसे में, रुपये की डेप्रिसिएशन (depreciation) की लॉन्ग-टर्म दर धीमी होने की उम्मीद है। इंफ्लेशन (inflation) में यह समानता करेंसी पर पड़ रहे स्ट्रक्चरल (structural) दबाव को कम करती है।

बाहरी झटकों से निपटने में भारत की मज़बूत स्थिति

रिपोर्ट इस बात पर भी रोशनी डालती है कि भारत अब बाहरी झटकों, खासकर तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, से निपटने में ज़्यादा सक्षम है। सर्विस एक्सपोर्ट (service exports) और गैर-निवासी भारतीयों (NRIs) से आने वाले रेमिटेंस (remittances) से होने वाली भारी विदेशी मुद्रा की कमाई, ट्रेड डेफिसिट (trade deficit) के खिलाफ एक मज़बूत हेज (hedge) का काम करती है। इसके अलावा, सोने की ऊंची कीमतों के कारण ज्वैलरी की मांग कम हुई है, जिससे सोने का आयात कम होने की संभावना है और करंट अकाउंट डेफिसिट (current account deficit) पर दबाव घटेगा।

भारतीय इक्विटी बाज़ार में वैल्यूएशन (Valuation) का नया आंकलन

DSP म्यूचुअल फंड का यह भी कहना है कि भारतीय इक्विटी बाज़ार, खासकर लार्ज-कैप (large-cap) स्टॉक्स, अब ज़्यादा आकर्षक वैल्यूएशन (valuation) पर ट्रेड कर रहे हैं। पहले के ऊंचे वैल्यूएशन (valuation) के कारण विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बाद, मौजूदा प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेश्यो ऐतिहासिक औसत के करीब आ गए हैं, और यह मज़बूत कॉर्पोरेट प्रॉफिट (corporate profits) के साथ मेल खा रहा है। यह बदलाव लॉन्ग-टर्म (long-term) निवेशकों के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है।

रिटेल निवेशकों के लिए सलाह

DSP MF रिटेल निवेशकों को सलाह देता है कि वे केवल करेंसी डेप्रिसिएशन (currency depreciation) के आधार पर कोई जल्दबाजी वाला फैसला न लें। रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा दबे हुए REER स्तर पर, खासकर टाइट इंफ्लेशन (inflation) डिफरेंशियल (differential) के साथ, रुपये के खिलाफ दांव लगाना कम संभावना वाला निवेश है। इसका सीधा मतलब है कि करेंसी की कीमत शायद पहले ही अपनी फंडामेंटल (fundamental) कमजोरियों को दर्शा चुकी है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.