रुपये में लगातार गिरावट
भारतीय रुपया (INR) अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार गिरता जा रहा है और हाल ही में यह 96.96 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया है। इस बड़ी गिरावट के कारण यह 2026 में अब तक की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली एशियाई करेंसी बन गई है, और अनुमानों के अनुसार यह 100/
$ के अहम स्तर को भी पार कर सकती है।
कच्चे तेल का असर
$110 प्रति बैरल के करीब कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें रुपये की कमजोरी का एक प्रमुख कारण हैं। भारत अपनी 85% तेल की जरूरतें आयात करता है, इसलिए ऊंची कीमतों का मतलब है कि डॉलर की मांग बढ़ जाती है, जिससे INR कमजोर होता है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 50% की गिरावट नहीं आई तो रुपये में बड़ी रिकवरी मुश्किल है। 2026 के लिए ब्रेंट क्रूड के अनुमानों में भिन्नता है; कुछ विश्लेषक कमजोर मांग-आपूर्ति के कारण औसतन $60/bbl की उम्मीद कर रहे हैं, जबकि अन्य भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में आपूर्ति संबंधी समस्याओं के कारण $96/bbl के आसपास कीमतों का अनुमान लगा रहे हैं। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) को उम्मीद है कि 2026 की दूसरी तिमाही में $106/bbl से घटकर साल के अंत तक कीमतें $79/bbl हो जाएंगी।
पूंजी का बहिर्वाह और घाटा
विदेशी पोर्टफोलियो (FPI) से लगातार हो रहे भारी आउटफ्लो से भी रुपये पर दबाव बढ़ रहा है। 2026 में, यह आउटफ्लो 2025 के स्तर को पार कर चुका है, जो ₹2.2 लाख करोड़ से अधिक हो गया है, जिसमें अप्रैल और मई में बड़ी रकम निकाली गई। पूंजी का यह निरंतर बहिर्वाह डॉलर की आपूर्ति-मांग संतुलन को और बिगाड़ रहा है। इसके अतिरिक्त, भारत का चालू खाता घाटा (CAD) एक दीर्घकालिक समस्या है, जो 2026 की तीसरी तिमाही में जीडीपी का 1.3% था और 2026 में 0.9% और 2027 में 2.3% तक बढ़ने की उम्मीद है। यह बढ़ता घाटा विदेशी मुद्रा भंडार पर और दबाव डाल रहा है।
RBI की हस्तक्षेप रणनीति
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बाजार को स्थिर करने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेच रहा है। RBI का ध्यान किसी विशेष विनिमय दर को बनाए रखने के बजाय अस्थिरता को प्रबंधित करने पर है। RBI ने तरलता (liquidity) और विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ावा देने के लिए $5 बिलियन के USD/INR खरीद/बिक्री स्वैप नीलामी की भी घोषणा की है। इन उपायों के बावजूद, हस्तक्षेप ने केवल रुपये की गिरावट को धीमा किया है, और यह अपनी गिरावट की ओर अग्रसर है।
विश्लेषकों की राय और प्रदर्शन
कुछ विश्लेषकों को RBI के हस्तक्षेप के कारण 95-97 के बीच अल्पकालिक स्थिरीकरण की उम्मीद है, जबकि अन्य का मानना है कि एक साल के भीतर 100/
$ का स्तर संभव है। 2026 के अंत तक USD/INR के लिए अनुमान 97-98 से लेकर ₹111.11 तक हैं। अन्य एशियाई मुद्राओं जैसे ताइवान डॉलर (Taiwan dollar) और थाई बाह्ट (Thai baht) के विपरीत, जो मजबूत हुई हैं, INR 2026 में 6.5% से अधिक कमजोर हुआ है। यह प्रदर्शन भारत की आर्थिक संरचना से जुड़ा है, जिसमें उच्च आयात निर्भरता और लगातार चालू खाता घाटा शामिल है, जो अधिक स्थिर निर्यात-संचालित अर्थव्यवस्थाओं के विपरीत है।
आगे की चुनौतियाँ
भारत के बाहरी संतुलन में कमजोरियां, पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के साथ मिलकर, रुपये के लिए प्रमुख चिंताएं हैं। तेल आयात पर देश की भारी निर्भरता इसे वैश्विक मूल्य झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती है। बढ़ता चालू खाता घाटा और 2026 में ₹2.2 लाख करोड़ से अधिक का महत्वपूर्ण FPI आउटफ्लो एक चिंताजनक तस्वीर पेश करता है। CAD के 2027 वित्तीय वर्ष में जीडीपी का 2.3% तक पहुंचने का अनुमान है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर और दबाव पड़ेगा। हालांकि EIA का 2026 के अंत तक $79/bbl तक तेल की कीमतों में गिरावट का अनुमान कुछ उम्मीद जगाता है, लेकिन निरंतर व्यवधान और भू-राजनीतिक जोखिम कीमतों को $90-$100/bbl के आसपास रख सकते हैं। इस स्थिति के लिए CAD को कम करने और स्थिर पूंजी प्रवाह को आकर्षित करने हेतु सावधानीपूर्वक नीतिगत कार्रवाइयों की आवश्यकता है, जिसमें संभावित रूप से ईंधन मूल्य समायोजन भी शामिल हो सकता है।
