भारतीय कंपनियां डॉलर खरीदने के लिए ऑनशोर मार्केट और नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड्स (NDF) के बीच आर्बिट्रेज का फायदा उठा रही हैं, जिससे रुपये पर दबाव बन रहा है। यह गतिविधि RBI के हस्तक्षेप के बावजूद जारी है।
कॉर्पोरेट आर्बिट्रेज का असर
भारतीय रुपये पर दबाव लगातार बढ़ रहा है क्योंकि देश की कॉर्पोरेट कंपनियाँ ऑनशोर फॉरेक्स मार्केट और नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड्स (NDF) मार्केट के बीच मूल्य के अंतर का फायदा उठा रही हैं। हाल ही में एक महीने के कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए यह स्प्रेड 4 से 6 पैसे के बीच रहा। इस आर्बिट्रेज रणनीति से, आयात और निर्यात करने वाली कंपनियाँ अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ा रही हैं।
करेंसी की स्थिरता पर प्रभाव
यह स्थिति भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए करेंसी की स्थिरता बनाए रखने की कोशिशों को और जटिल बना रही है। आमतौर पर, RBI फॉरेक्स मार्केट में हस्तक्षेप करके रुपये की अस्थिरता को नियंत्रित करता है। लेकिन, हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि कॉर्पोरेट लेनदेन से होने वाली डॉलर की लगातार मांग के कारण RBI के हस्तक्षेप का असर कम हो रहा है। कच्चे तेल की कीमतों जैसे ग्लोबल फैक्टर के अलावा, यह घरेलू आर्बिट्रेज गतिविधि हालिया कमजोरी का एक महत्वपूर्ण कारण बन गई है।
आर्बिट्रेज पर रेगुलेटरी रोक
ज्यादा या सट्टा आधारित आर्बिट्रेज को रोकने के लिए, RBI ने मार्च के अंत में कुछ नियम लागू किए थे। इन नियमों के तहत, बैंक ऑनशोर मार्केट में रुपये के लिए $100 मिलियन तक की नेट ओपन पोजीशन रख सकते हैं। इस कदम से बैंकों को क्लाइंट एक्सपोजर को मैनेज करने के लिए इंटरबैंक मार्केट में ऑफसेटिंग ट्रेड करने पड़ते हैं, जिससे आर्बिट्रेज गतिविधियों का पैमाना सीमित होता है और कॉर्पोरेशन्स के लिए प्राइस स्प्रेड कम हो जाते हैं।
इन पाबंदियों के बावजूद, बैंक उन कॉर्पोरेट क्लाइंट्स के लिए ये ट्रेड करने को तैयार हैं जो अपने आयात या निर्यात व्यवसाय के लिए जरूरी दस्तावेज़ प्रदान कर सकते हैं। निवेशकों के लिए, इसका मतलब है कि जब बाहरी कारक स्थिर हों तब भी करेंसी इन कॉर्पोरेट फ्लो पर प्रतिक्रिया दिखा सकती है। भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि RBI की पोजीशन लिमिट कितनी प्रभावी रहती है और क्या सेंट्रल बैंक इन डॉलर-मांग वाले लेनदेन की मात्रा को प्रबंधित करने के लिए और समायोजन करता है।
