आज यानी 2 जुलाई 2026 को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले **18 पैसे** कमजोर होकर **95.34** के स्तर पर बंद हुआ। घरेलू शेयर बाजार में तेजी के बावजूद, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली (selling) और आयातकों (importers) की ओर से डॉलर की भारी मांग रुपये पर दबाव बनाए हुए है। साल 2026 में अब तक विदेशी फंडों (funds) की कुल निकासी (withdrawal) पिछले साल के कुल आउटफ्लो (outflow) को पार कर चुकी है।
क्या हुआ?
2 जुलाई 2026 को भारतीय रुपये में गिरावट दर्ज की गई, जो अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.34 पर बंद हुआ। यह पिछले कारोबारी दिवस के 95.16 के मुकाबले 18 पैसे की गिरावट है। शुरुआत में रुपये में कुछ रिकवरी के संकेत दिखे थे, लेकिन यह मोमेंटम (momentum) ज्यादा देर तक नहीं टिक पाया। रुपये में यह गिरावट मुख्य रूप से दो वजहों से आई: आयातकों और कॉर्पोरेशन्स (corporations) की ओर से डॉलर की मजबूत मांग और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा लगातार भारतीय संपत्तियों की बिकवाली।
FIIs की बिकवाली का ट्रेंड
रुपये पर यह दबाव विदेशी पैसों के भारतीय बाजार से निकलने की रिकॉर्ड रफ्तार से जुड़ा है। अकेले जून 2026 में, विदेशी निवेशकों ने ₹49,340 करोड़ निकाले। सबसे अहम बात यह है कि 2026 में अब तक कुल निकासी ₹2.7 लाख करोड़ तक पहुंच गई है, जो कि पूरे 2025 में हुई कुल निकासी से ज्यादा है। विदेशी संस्थाओं की यह लगातार बिकवाली बाजार में रुपये की सप्लाई बढ़ा रही है, क्योंकि निवेशक अपना पैसा वापस डॉलर में बदल रहे हैं, जिससे स्वाभाविक रूप से रुपये की कीमत गिर रही है।
बाजार का विरोधाभास: इंडेक्स चढ़े, रुपया गिरा
दिलचस्प बात यह है कि रुपये में गिरावट ऐसे समय में आई है जब घरेलू शेयर बाजारों ने अच्छा प्रदर्शन किया। उसी दिन, सेंसेक्स 579.48 अंक और निफ्टी 169.85 अंक चढ़ा। यह दर्शाता है कि जहां घरेलू निवेशक शेयर सूचकांकों (indices) को सहारा दे रहे हैं, वहीं करेंसी मार्केट (currency market) मैक्रो-इकोनॉमिक फ्लो (macro-economic flows) और विदेशी मुद्रा की मांग पर ज्यादा प्रतिक्रिया दे रहा है। बढ़ते शेयर सूचकांकों और गिरते रुपये के बीच यह अंतर बताता है कि इक्विटी मार्केट का सेंटिमेंट (sentiment) और करेंसी की मजबूती फिलहाल अलग-अलग दिशाओं में जा रही है।
आयातकों पर क्यों पड़ रहा है दबाव?
जब रुपया कमजोर होता है, तो आयात महंगा हो जाता है। जिन कंपनियों को डॉलर में कच्चा माल या ईंधन आयात करने पर निर्भर रहना पड़ता है, उनके मुनाफे पर असर पड़ता है क्योंकि उन्हें समान मात्रा के सामान के लिए अधिक रुपये चुकाने पड़ते हैं। हालांकि, वैश्विक ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent crude oil) की कीमतों में USD 70.55 प्रति बैरल तक की गिरावट से आयात बिल कम होने की उम्मीद है, जिससे कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन यह रुपये को गिरने से रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। निवेशकों के लिए, यह उन कंपनियों के आने वाले तिमाही नतीजों (quarterly results) में देखने लायक अहम बात है जो भारी आयातक हैं।
निवेशकों को आगे क्या देखना चाहिए?
निवेशकों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि FIIs की बिकवाली का यह सिलसिला कब तक जारी रहता है। प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर का मूवमेंट (dollar index) भी महत्वपूर्ण होगा; यदि डॉलर वैश्विक स्तर पर मजबूत बना रहता है, तो यह रुपये पर दबाव बनाए रखेगा। इसके अतिरिक्त, अमेरिकी रोजगार डेटा (US employment data) और अमेरिका-ईरान डील (US-Iran deal) से संबंधित भू-राजनीतिक स्थिति (geopolitical situation) के अपडेट भी महत्वपूर्ण ट्रिगर (triggers) बने रहेंगे जो बाजार की भावना को बदल सकते हैं। ट्रेडर और निवेशक संभवतः इस बात पर नजर रखेंगे कि क्या भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अत्यधिक अस्थिरता को प्रबंधित करने के लिए हस्तक्षेप करेगा, खासकर यदि मुद्रा 95.60 रेंज जैसे निचले स्तरों के करीब पहुंचती है।
