आज शुरुआती कारोबार में भारतीय रुपये (Indian Rupee) में बड़ी गिरावट देखने को मिली। डॉलर के मुकाबले रुपया 96 के स्तर को पार कर गया, जो पिछले कई महीनों का निचला स्तर है।
कच्चे तेल की कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव बने बड़ी वजह
रुपये में इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी है। भारत कच्चे तेल का एक बड़ा आयातक देश है, और जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो आयात के भुगतान के लिए डॉलर की मांग बढ़ जाती है, जिससे घरेलू मुद्रा पर दबाव बनता है।
इस स्थिति को हाल के भू-राजनीतिक तनावों ने और भी जटिल बना दिया है। निवेशक सुरक्षित माने जाने वाले एसेट्स जैसे अमेरिकी डॉलर की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राएं कमजोर हो रही हैं।
RBI का दखल और बाजार की प्रतिक्रिया
रुपये को और गिरने से रोकने के लिए, सरकारी बैंकों ने बाजार में डॉलर बेचना शुरू कर दिया, जो आमतौर पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से किया जाता है। सोमवार को इन हस्तक्षेपों ने रुपये को कुछ हद तक संभालने में मदद की थी, लेकिन मंगलवार के कारोबारी सत्र में डॉलर की भारी मांग हावी रही।
बाजार की स्थिरता बनाए रखने में RBI की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है। केंद्रीय बैंक एक प्रतिस्पर्धी मुद्रा की आवश्यकता और अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है, जिसका असर आयात लागत पर पड़ सकता है।
आगे क्या?
रुपये की दिशा आने वाले समय में वैश्विक मैक्रोइकॉनॉमिक डेटा पर निर्भर करेगी। बाजार बुधवार को अमेरिका के कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) डेटा जारी होने का इंतजार कर रहा है। इस महंगाई के आंकड़ों से अमेरिकी ब्याज दरों की भविष्य की दिशा के बारे में पता चलने की उम्मीद है, जो सीधे डॉलर इंडेक्स की मजबूती को प्रभावित करता है।
अगर अमेरिका में महंगाई लगातार बढ़ती रहती है, तो डॉलर अपनी मौजूदा मजबूती बनाए रख सकता है, जिससे रुपया दबाव में बना रहेगा। इसके अलावा, विदेशी निवेश प्रवाह की गति, भारत के व्यापार घाटे का आकार और विदेशी मुद्रा की कॉरपोरेट मांग जैसे कारक भी महत्वपूर्ण रहेंगे।
