आज भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत तेजी के साथ होने की उम्मीद है। गिफ्ट निफ्टी (GIFT Nifty) में करीब **80** अंकों की बढ़त दिख रही है। अमेरिका-ईरान के बीच शांति समझौते की खबर और कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी से बाजार को सहारा मिला है, जिससे महंगाई को लेकर चिंताएं कम हुई हैं। हालांकि, अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) की तरफ से इस साल ब्याज दरें बढ़ाने के संकेत ने निवेशकों को थोड़ा सतर्क कर दिया है। डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) खरीदारी कर बाजार को सहारा दे रहे हैं, जबकि फॉरेन इन्वेस्टर्स (FIIs) बिकवाली कर रहे हैं।
क्या हुआ?
18 जून, 2026 को भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत पॉजिटिव रहने की संभावना है। गिफ्ट निफ्टी फ्यूचर्स में लगभग 80 अंकों की बढ़त देखी जा रही है। ग्लोबल बाजारों में आई तेजी, खासकर अमेरिका-ईरान शांति समझौते की घोषणा के बाद, इस शुरुआती उम्मीद को बल मिला है। इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतें $80 प्रति बैरल से नीचे बनी हुई हैं, जिसने बाजार के सेंटिमेंट को काफी बढ़ावा दिया है।
कच्चे तेल की गिरती कीमतों से राहत
भारतीय निवेशकों के लिए कच्चे तेल की कीमतों में नरमी एक अहम फैक्टर है। भारत एक बड़ा क्रूड ऑयल इंपोर्टर (Crude Oil Importer) है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में कमी से देश का इंपोर्ट बिल कम होता है और महंगाई पर लगाम लग सकती है। जब तेल की कीमतें गिरती हैं, तो यह ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (Oil Marketing Companies) जैसे सेक्टर्स और ओवरऑल इकोनॉमिक स्टेबिलिटी (Economic Stability) के लिए अच्छा माना जाता है। फिलहाल WTI क्रूड लगभग $75.82 प्रति बैरल और ब्रेंट क्रूड $80 से नीचे ट्रेड कर रहा है। इससे घरेलू इनपुट कॉस्ट (Input Cost) पर तत्काल दबाव कम होता दिख रहा है, जिसे बाजार फिलहाल सपोर्टिव मान रहा है।
फेडरल रिजर्व की चुनौती
जहां एक ओर भू-राजनीतिक खबरें सकारात्मक हैं, वहीं निवेशक अमेरिकी फेडरल रिजर्व के लेटेस्ट अपडेट पर भी गौर कर रहे हैं। फेड ने ब्याज दरों को 3.5% से 3.75% की रेंज में अपरिवर्तित रखने का फैसला किया है। हालांकि, सेंट्रल बैंक ने यह भी संकेत दिया है कि 2026 के अंत तक दरें बढ़ाई जा सकती हैं। फेड फंड्स रेट (Fed Funds Rate) के लिए अनुमानों को बढ़ाकर 3.8% कर दिया गया है। फेड का यह हॉकिश (Hawkish) या सतर्क रवैया एक चेतावनी की तरह काम कर रहा है। अगर ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स (Interest Rates) हाई रहते हैं या और बढ़ते हैं, तो भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स (Emerging Markets) विदेशी पूंजी के लिए कम आकर्षक हो सकते हैं, जिससे भू-राजनीतिक राहत और मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) की सावधानी के बीच बाजार सेंटिमेंट में खिंचाव पैदा हो सकता है।
बाजार की चाल और निवेशकों का फ्लो
घरेलू ट्रेडिंग पैटर्न में फॉरेन और लोकल इन्वेस्टर्स के बीच एक स्पष्ट अंतर दिख रहा है। NSE के प्रोविजनल डेटा के मुताबिक, फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) 17 जून को ₹101.59 करोड़ की बिकवाली के साथ नेट सेलर्स (Net Sellers) रहे। हालांकि, डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) ने ₹1,561.40 करोड़ की नेट खरीदारी के साथ एक्टिव बायर (Active Buyer) बनकर इस बिकवाली की भरपाई से ज्यादा की। घरेलू संस्थानों की यह लगातार भागीदारी अक्सर भारतीय बाजार के लिए एक कुशन का काम करती है, जो विदेशी पूंजी के बाहर जाने पर भी स्थिरता प्रदान करती है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
आगे चलकर, निवेशक अमेरिका-ईरान डील के बाद ग्लोबल जियो-पॉलिटिकल (Geopolitical) स्थिति के विकास पर नजर रख सकते हैं और यह देख सकते हैं कि क्या कच्चे तेल की कीमतें इन निचले स्तरों पर बनी रह पाती हैं। भारतीय रुपए (Indian Rupee) की चाल भी महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि करेंसी की स्थिरता इंपोर्ट कॉस्ट और फॉरेन इन्वेस्टमेंट फ्लो (Foreign Investment Flows) से जुड़ी होती है। अंत में, DIIs की लगातार खरीदारी पर नजर रखना अहम है, क्योंकि यह बाजार के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है। निवेशक यह देखने के लिए आने वाले घरेलू आर्थिक डेटा (Economic Data) या कंपनी कमेंट्री (Company Commentary) पर भी नजर रख सकते हैं कि क्या कमोडिटी की कीमतों में नरमी वाकई प्रमुख सेक्टर्स के प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margins) को मदद कर रही है।
