इस हफ्ते भारतीय शेयर बाज़ारों की चाल अमेरिकी-ईरान की बातचीत, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और मॉनसून की प्रगति पर निर्भर करेगी। पिछले हफ्ते सेंसेक्स में **1.68%** की बढ़त देखने को मिली थी।
क्या चल रहा है?
निवेशक एक ऐसे हफ़्ते की तैयारी कर रहे हैं जहाँ अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और घरेलू मौसम का मिज़ाज बाज़ार की दिशा तय कर सकता है। बाज़ार की नज़र स्विट्जरलैंड में होने वाली अमेरिकी-ईरान की तकनीकी बातचीत पर है, जिसका मकसद सालों पुराने राजनयिक मतभेदों को सुलझाना है। तनाव के कारण पहले इन वार्ताओं का पहला दौर टाल दिया गया था।
क्यों ज़रूरी है कच्चा तेल?
कच्चे तेल की कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक अहम पहलू बनी हुई हैं। भारत अपनी ज़रूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात करता है, इसलिए कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे तौर पर आयात बिल और महंगाई पर असर डालता है। अगर तेल की कीमतें स्थिर रहती हैं, तो यह मैक्रोइकॉनॉमिक्स के लिए अच्छा होता है। लेकिन, मध्य-पूर्व में किसी भी तरह का तनाव सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ा सकता है और वैश्विक तेल कीमतों को आसमान पर पहुंचा सकता है।
भू-राजनीतिक जोखिम और निवेशकों का मूड
भू-राजनीतिक अनिश्चितता अक्सर शेयर बाज़ारों में ज़्यादा उतार-चढ़ाव लाती है। जब तनाव बढ़ता है, तो निवेशक सुरक्षित निवेश की ओर बढ़ते हैं। पिछले हफ़्ते भारतीय शेयर बाज़ारों ने अच्छा प्रदर्शन किया था और BSE सेंसेक्स 1,274.95 अंक यानी 1.68% चढ़ा था। इस तेज़ी की मुख्य वजह भू-राजनीतिक चिंताएं कम होना और तेल की कीमतों में आई नरमी थी।
मॉनसून का फैक्टर
अंतरराष्ट्रीय खबरों के अलावा, भारत में मॉनसून की प्रगति एक अहम घरेलू संकेत है। खेती भारतीय अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा है, और सामान्य मॉनसून ग्रामीण आय और महंगाई को काबू में रखने के लिए ज़रूरी है। Geojit Investments Limited के विश्लेषकों ने सतर्क रहने की सलाह दी है।
आगे क्या देखना है?
आने वाले दिनों में, निवेशकों को अमेरिकी-ईरान राजनयिक बैठकों से किसी भी आधिकारिक अपडेट और वैश्विक कच्चे तेल के बेंचमार्क में दैनिक उतार-चढ़ाव पर नज़र रखनी चाहिए। इसके अलावा, मॉनसून का फैलाव घरेलू निवेशकों का भरोसा तय करेगा। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) के प्रवाह पर भी नज़र रहेगी।
