29 जून, 2026 को भारतीय शेयर बाज़ार में नरमी के साथ शुरुआत होने की उम्मीद है। निवेशक कल होने वाले मंथली F&O कॉन्ट्रैक्ट एक्सपायरी (Expiry) के लिए तैयार हैं। हालिया तेजी के बाद अब बाज़ार में कंसॉलिडेशन (Consolidation) देखने को मिल सकता है, जबकि पार्टिसिपेंट्स डोमेस्टिक इकोनॉमिक डेटा और विदेशी संस्थागत फ्लो (FII/FPI Flows) पर नज़र बनाए हुए हैं।
क्या हुआ?
गिफ्ट निफ्टी (Gift Nifty) के शुरुआती संकेतों के आधार पर, आज भारतीय शेयर बाज़ार में फ्लैट या थोड़ी कमजोरी के साथ शुरुआत होने की संभावना है। यह लगातार तीन हफ्तों की बाज़ार बढ़त के बाद हो रहा है। निवेशक अब मंथली फ्यूचर्स एंड ऑप्शन्स (F&O) कॉन्ट्रैक्ट सेटलमेंट पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जो 30 जून को समाप्त होने वाला है। इस अवधि के दौरान, ट्रेडर्स आमतौर पर अपनी पोज़िशन्स को स्क्वायर ऑफ करते हैं, कॉन्ट्रैक्ट्स को अगले महीने के लिए रोलओवर करते हैं, या उन्हें एग्जिट करते हैं, जिससे अक्सर इंडेक्स और व्यक्तिगत स्टॉक्स में अस्थिरता (Volatility) बढ़ जाती है।
मंथली सेटलमेंट का असर
आगामी F&O एक्सपायरी कंसॉलिडेशन की उम्मीद का एक मुख्य कारण है। भारतीय शेयर बाज़ार में, महीने का आखिरी गुरुवार (या महीने का आखिरी कारोबारी दिन) मंथली डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए एक मानक सेटलमेंट दिन होता है। जैसे-जैसे समय सीमा नजदीक आती है, बाज़ार पार्टिसिपेंट्स अपने पोर्टफोलियो को एडजस्ट करने के कारण भारी ट्रेडिंग गतिविधि अक्सर देखी जाती है। इस प्रक्रिया से अल्पावधि में प्राइस मूवमेंट हो सकते हैं, भले ही कंपनियों के लॉन्ग-टर्म बिजनेस आउटलुक (Business Outlook) अपरिवर्तित रहें। निवेशकों के लिए, यह अवधि अक्सर एक ऐसा दौर होता है जहाँ बाज़ार नई दिशा तय करने से पहले हालिया प्राइस मूवमेंट्स को डाइजेस्ट करने के लिए रुकता है।
घरेलू आर्थिक डेटा पर नज़र
इस हफ्ते, बाज़ार का मूड प्रमुख घरेलू आर्थिक रिलीज से काफी प्रभावित होगा। निवेशक इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन इंडेक्स (IIP) के नवीनतम आंकड़ों का इंतजार कर रहे हैं, जो भारत के औद्योगिक क्षेत्र के स्वास्थ्य को ट्रैक करते हैं। इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक वित्त की स्थिति को समझने के लिए सरकार के फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) डेटा की बारीकी से जांच की जाएगी। HSBC मैन्युफैक्चरिंग, सर्विसेज और कंपोजिट परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) के फाइनल रीडिंग्स भी आने वाले हैं। ये इंडिकेटर्स अर्थव्यवस्था में बिजनेस कॉन्फिडेंस और डिमांड लेवल्स का एक स्नैपशॉट प्रदान करते हैं, जिससे निवेशकों को यह अंदाजा लगाने में मदद मिलती है कि डोमेस्टिक ग्रोथ मोमेंटम स्थिर है या नहीं।
विदेशी निवेशक सेंटीमेंट में बदलाव
जून के उत्तरार्ध में एक उल्लेखनीय ट्रेंड फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) से सेलिंग प्रेशर (Selling Pressure) में कमी रही है। जहां FPIs पहले आक्रामक सेलर्स थे, वहीं हाल के हफ्तों में उन्हें कई ट्रेडिंग सेशन में बायर्स (Buyers) बनते देखा गया है। इस व्यवहार परिवर्तन के लिए दो कारक काफी हद तक जिम्मेदार हैं। पहला, भारतीय रुपया (Indian Rupee) में स्थिरता और अमेरिकी डॉलर (US Dollar) के मुकाबले थोड़ी मजबूती के संकेत दिखे हैं, जो विदेशी निवेश के मूल्य को बचाने में मदद करता है। दूसरा, अन्य एशियाई बाज़ारों, विशेष रूप से दक्षिण कोरिया और ताइवान में बढ़ी हुई अस्थिरता ने ग्लोबल फंड्स को उनके क्षेत्रीय आवंटन (Regional Allocations) पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया है, जिससे भारतीय इक्विटी (Equities) पर अधिक संतुलित दृष्टिकोण बना है।
ग्लोबल क्यूज और इंटरेस्ट रेट फैक्टर
वैश्विक स्तर पर, सेंटीमेंट मिश्रित बना हुआ है। निवेशक संयुक्त राज्य अमेरिका में लगातार उच्च ब्याज दरों की संभावना को टेक्नोलॉजी सेक्टर (Technology Sector) से बेहतर कमाई के साथ संतुलित कर रहे हैं। आज शुरुआती ट्रेडिंग में, एशिया-प्रशांत क्षेत्र (Asia-Pacific Region) में इक्विटी में कुछ गिरावट का सामना करना पड़ा, जिसमें दक्षिण कोरिया के बाज़ारों में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई। इस तरह के क्षेत्रीय मूवमेंट अक्सर ऐसी लहरें बनाते हैं जो भारतीय बाज़ार के सेंटीमेंट को प्रभावित करती हैं, क्योंकि ग्लोबल फंड्स अक्सर इन रुझानों के आधार पर पूरे क्षेत्र में अपने पोर्टफोलियो को एडजस्ट करते हैं।
निवेशक क्या ट्रैक करें?
इस सप्ताह के बाकी दिनों के लिए, मुख्य मॉनिटरेबल F&O सेटलमेंट का पूरा होना होगा। एक बार यह प्रक्रिया समाप्त हो जाने के बाद, बाज़ार संभवतः ऊपर बताए गए आर्थिक डेटा पर ध्यान केंद्रित करेगा। निवेशक यह भी ट्रैक कर सकते हैं कि FPI सेलिंग में कमी का ट्रेंड जारी रहता है या नहीं, क्योंकि लगातार विदेशी खरीदारी ऐतिहासिक रूप से भारतीय बाज़ार के लिए एक मजबूत ड्राइवर रही है। बिजनेस-विशिष्ट डेवलपमेंट (Business-specific Developments) महत्वपूर्ण बने रहेंगे, लेकिन अगले कुछ सेशन संभवतः इन मैक्रो-लेवल फैक्टर्स (Macro-level Factors) द्वारा परिभाषित किए जाएंगे।
