जून के महीने में भारतीय शेयर बाज़ारों में मिला-जुला प्रदर्शन देखने को मिला। IT सेक्टर में **9.5%** की गिरावट आई, जबकि रियलटी और फार्मा सेक्टर में तेज़ी दर्ज की गई। वहीं, RBI की लेटेस्ट फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट के अनुसार, बैंकों की स्थिति मज़बूत है, लेकिन कुछ NBFCs को गंभीर दबाव में कैपिटल की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
क्या हुआ?
भारतीय इक्विटी बाज़ारों ने जून का महीना मिला-जुले रुझान के साथ समाप्त किया। जहां निफ्टी 50 इंडेक्स ने मासिक आधार पर 1.5% की बढ़त हासिल की, वहीं महीने के आखिरी कारोबारी दिन, 30 जून को, बेंचमार्क सेंसेक्स और निफ्टी 50 में करीब 0.3% की गिरावट आई। इस महीने में घरेलू मांग पर केंद्रित सेक्टर्स, जिन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया, और निर्यात-उन्मुख या ग्लोबल से जुड़े सेक्टर्स, जिनमें भारी बिकवाली हुई, के बीच एक बड़ा अंतर देखने को मिला।
सेक्टर्स में दिखा बड़ा अंतर
बाज़ार के प्रदर्शन ने अर्थव्यवस्था के विभिन्न हिस्सों के बीच एक स्पष्ट विभाजन को उजागर किया। IT सेक्टर सबसे ज़्यादा प्रभावित रहा, जिसने पूरे महीने में करीब 9.5% का नुकसान झेला। Persistent Systems और Wipro जैसी कंपनियों में खास कमजोरी देखी गई। यह सेक्टर लगातार दूसरे महीने गिरावट में रहा, जो ग्लोबल मांग की अनिश्चितताओं को दर्शाता है।
इसके विपरीत, मज़बूत घरेलू मांग वाले सेक्टर्स ने अच्छा प्रदर्शन किया। निफ्टी रियलटी इंडेक्स 6% से ज़्यादा उछला, जिसमें Prestige Estates और Phoenix Mills जैसे स्टॉक्स का योगदान रहा। इसी तरह, निफ्टी फार्मा इंडेक्स एक नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो लगातार तीसरे महीने की वृद्धि को दर्शाता है। Ajanta Pharma और IPCA Laboratories ने इसे सहारा दिया। निफ्टी बैंक इंडेक्स ने भी Federal Bank और IDFC First Bank के नेतृत्व में 6% की मज़बूत मासिक बढ़त दर्ज की।
RBI की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट से अहम खुलासे
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट जारी की, जिसने वित्तीय प्रणाली के स्वास्थ्य का जायज़ा पेश किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि बाहरी झटके मैक्रोइकॉनॉमिक आउटलुक के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं, लेकिन भारत के घरेलू फंडामेंटल्स इन दबावों के खिलाफ एक बफर बने हुए हैं। एक मुख्य सकारात्मक बात बैंकिंग सेक्टर का अनुमानित स्वास्थ्य है; RBI के स्ट्रेस टेस्ट से पता चलता है कि बेसलाइन परिदृश्य के तहत, मार्च 2028 तक बैंकों के ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) लगभग 1.9% रहने का अनुमान है।
हालांकि, रिपोर्ट में नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज़ (NBFCs) को लेकर भी चेतावनी दी गई है। गंभीर क्रेडिट स्ट्रेस के एक परिदृश्य में, 15 NBFCs ऐसी हो सकती हैं जिनके कैपिटल लेवल न्यूनतम आवश्यक सीमा से नीचे जा सकते हैं। यह निवेशकों के लिए एकreminder है कि वे NBFCs की कैपिटल एडिक्वेसी और लिक्विडिटी की स्थिति पर नज़र रखें, खासकर आर्थिक अस्थिरता के दौर में।
मार्केट सेंटिमेंट को प्रभावित करने वाले कारक
जून के अंत में कई कारकों ने निवेशकों की भावना को प्रभावित किया। 30 जून को बाज़ार में गिरावट का एक कारण मासिक एक्सपायरी भी थी, जिस दौरान ट्रेडर्स अक्सर अपनी पोजीशन बंद करते हैं, जिससे अस्थिरता बढ़ जाती है। तकनीकी कारकों के अलावा, अमेरिका-ईरान वार्ता को लेकर अनिश्चितता ने भी चिंता बढ़ाई, जिसका असर कच्चे तेल की कीमतों और ग्लोबल रिस्क एपेटाइट पर पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त, विदेशी फंड का बहिर्वाह (outflows) और मानसून की सुस्त गति को लेकर चिंताएं भी माहौल को प्रभावित कर रही हैं, क्योंकि ये कारक भारतीय अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता खर्च और महंगाई की उम्मीदों को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं।
आगे निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
आने वाले हफ़्ते यह आंकने के लिए महत्वपूर्ण होंगे कि क्या ये रुझान जारी रहते हैं। निवेशक मानसून की प्रगति पर नज़र रख सकते हैं, क्योंकि यह ग्रामीण मांग और महंगाई का एक प्रमुख चालक है। इसके अलावा, वैश्विक भू-राजनीति में होने वाले घटनाक्रम और कमोडिटी की कीमतों पर उनका प्रभाव देखना ज़रूरी होगा। वित्तीय क्षेत्र के संदर्भ में, NBFCs के कैपिटल बफ़र्स और बैंकों की एसेट क्वालिटी अर्थव्यवस्था की समग्र मज़बूती के महत्वपूर्ण संकेतक बने रहेंगे।
