बाजार में रिकॉर्ड ट्रेडिंग, पर कंपनियों की वैल्यू में गिरावट!
जनवरी 2026 में भारतीय शेयर बाजारों में ट्रेडिंग वॉल्यूम ने पिछले 15 महीनों का रिकॉर्ड तोड़ दिया। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के इक्विटी कैश सेगमेंट का एवरेज डेली टर्नओवर (ADT) ₹1,19,560 करोड़ रहा, जो दिसंबर की तुलना में 27% ज्यादा और पिछले साल इसी अवधि की तुलना में 24% अधिक है [cite: Source A]। इस वॉल्यूम की बढ़ोतरी के पीछे दो मुख्य वजहें रहीं: एक तो रिटेल निवेशकों का बाज़ार में आई गिरावट का फायदा उठाना और दूसरा, हाल ही में हुए इंडिया-यूएस ट्रेड डील के बाद फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPI) की वापसी। एफपीआई, जिन्होंने 2025 के दौरान और जनवरी 2026 की शुरुआत में भारी बिकवाली की थी (जनवरी में नेट $3.95 बिलियन का आउटफ्लो), वे फरवरी के पहले हफ्ते में लगभग ₹8,129 करोड़ का निवेश कर बाज़ार में लौटे [cite: Search Result 1, 2]। इस डील से भू-राजनीतिक तनाव कम हुआ और बाज़ार के लिए पूर्वानुमान बेहतर हुआ [cite: Search Result 11, 12]।
मार्केट कैप में गिरावट और चुनिंदा शेयरों पर फोकस
लेकिन, इस रिकॉर्ड ट्रेडिंग के विपरीत, पूरे बाजार की कुल वैल्यूएशन यानी मार्केट कैप में गिरावट आई। जनवरी 2026 में NSE के कैश सेगमेंट का एग्रीगेट मार्केट कैपिटलाइज़ेशन 4% घटकर ₹4.58 लाख करोड़ रह गया। यह गिरावट मिड-कैप और स्मॉल-कैप सेगमेंट्स में और भी ज्यादा देखी गई। मिड कैप सेलेक्ट इंडेक्स 3.4% और निफ्टी स्मॉल कैप 100 इंडेक्स 4.7% नीचे आया [cite: Source A, Search Result 3]। यह ट्रेंड दिखाता है कि निवेशक ज़्यादा वोलेटिलिटी (volatility) वाले सेगमेंट्स से थोड़ा बचते नज़र आए। वहीं, इस दौरान बेंचमार्क सेंसेक्स (Sensex) में 1.63% की गिरावट आई, जबकि निफ्टी 50 में 3.0% का घाटा दर्ज किया गया [cite: Search Result 4, 5]।
सेक्टर्स में दिखा बड़ा अंतर
सेक्टोरल परफॉरमेंस (sectoral performance) भी इस चुनिंदा निवेश (selectivity) को साफ दिखाती है। मेटल्स सेक्टर 5.91% की बढ़त के साथ लीडर बनकर उभरा, इसके बाद पीएसयू बैंक (PSU Banks) +5.8% और आईटी (IT) +0.9% रहे [cite: Search Result 6, 7]। ये वे सेक्टर्स हैं जो वैश्विक मांग से जुड़े हैं या जिन्हें डिफेन्सिव (defensive) माना जाता है। वहीं, डोमेस्टिक डिमांड पर निर्भर सेक्टर्स जैसे एफएमसीजी (FMCG) में -7.7%, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स (Consumer Durables) में -6.4% और ऑटो (Auto) में -5.11% की भारी गिरावट आई [cite: Search Result 6, 7]।
'क्राउडिंग ट्रेड्स' का बढ़ता खतरा
सिर्फ यही नहीं, NSE पर ट्रेड होने वाले स्टॉक्स की संख्या भी दिसंबर के 4,020 से घटकर जनवरी में 3,911 रह गई [cite: Source A]। इसका मतलब है कि निवेशक अब कम, लेकिन ज्यादा लिक्विड (liquid) और बड़ी कंपनियों में अपना पैसा लगा रहे हैं। व्हाइटस्पेस अल्फा के सीईओ और फंड मैनेजर, पुनीत शर्मा के मुताबिक, 'यह 'क्राउडिंग ट्रेड्स' (crowding trades) का माहौल बनाता है, जहाँ कुछ चुनिंदा बड़े स्टॉक्स पर बिकवाली का दबाव ज्यादा पड़ सकता है' [cite: Search Result 8, 9]।
वैल्यूएशन पर चिंता और आगे की राह
बाजार में कंसोलिडेशन (consolidation) के बावजूद, भारतीय सेक्टर्स का एवरेज P/E रेश्यो (Price-to-Earnings ratio) थोड़ा आकर्षक हुआ है, लेकिन यह अंदरूनी बड़े अंतरों को छुपाता है। 7 फरवरी 2026 तक सेंसेक्स का P/E रेश्यो 23.150 था [cite: Search Result 10]। वहीं, कुछ आउटपरफॉर्मिंग सेक्टर्स के स्टॉक्स अभी भी ऊंचे वैल्यूएशन मल्टीपल्स पर ट्रेड कर रहे हैं। जनवरी 2026 में एफपीआई के भारी आउटफ्लो के बाद फरवरी की शुरुआत में आई तेजी, ग्लोबल इनवेस्टर्स की भारतीय इक्विटी वैल्यूएशन को लेकर सतर्कता को भी दर्शाती है [cite: Search Result 11, 12]। इसके अलावा, रुपये की मजबूती बनी हुई है, लेकिन यह ग्लोबल ट्रेड और यूएस मॉनेटरी पॉलिसी पर निर्भर करेगी। BSE, जो खुद एक लिस्टेड एक्सचेंज है, उसका मार्केट कैप लगभग ₹1.18 लाख करोड़ और TTM P/E रेश्यो 65.28 है, जो इसके शेयर की कमाई के मुकाबले काफी ज्यादा वैल्यूएशन दिखाता है [cite: Search Result 13, 14]।
भविष्य का नज़रिया: सतर्कता के साथ उम्मीद
आगे चलकर, एनालिस्ट्स का कहना है कि बाज़ार की चाल आय (earnings) में स्थिरता और निवेशकों के कॉन्फिडेंस पर निर्भर करेगी [cite: Search Result 15]। उम्मीद है कि एफपीआई की नई दिलचस्पी और डोमेस्टिक पॉलिसी मेजर्स से कुछ स्टेबिलिटी मिलेगी। हालांकि, ग्लोबल अनिश्चितता और करेंसी के उतार-चढ़ाव को लेकर चिंताएं बनी रहेंगी [cite: Search Result 16]। बाज़ार का असली टेस्ट यह होगा कि क्या यह चुनिंदा लार्ज-कैप स्टॉक्स से निकलकर व्यापक भागीदारी (broader participation) दिखा पाता है या नहीं। ऐसे में, कम वैल्यूएशन वाले और कम भीड़भाड़ वाले सेक्टर्स में निवेश करने की स्ट्रेटेजी (strategy) समझदारी भरी साबित हो सकती है।