HSBC इंडिया बिजनेस आउटलुक सर्वे के अनुसार, भारतीय प्राइवेट कंपनियों का बिजनेस कॉन्फिडेंस अक्टूबर 2023 के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गया है। आने वाले 12 महीनों में कंपनियों को ऑपरेटिंग कॉस्ट में बढ़ोतरी और तगड़ी कॉम्पिटिशन से प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव की आशंका है। हालांकि, इसके बावजूद कंपनियां डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और R&D में निवेश की योजना बना रही हैं।
लागत वृद्धि और प्राइसिंग पावर की चुनौती
भारतीय प्राइवेट सेक्टर के बिजनेस अगले साल को लेकर थोड़ी सावधानी बरत रहे हैं। HSBC इंडिया बिजनेस आउटलुक सर्वे के लेटेस्ट आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 में बिजनेस एक्टिविटी बढ़ने की उम्मीद रखने वाली कंपनियों का नेट बैलेंस 35% (फरवरी का आंकड़ा) से घटकर 22% रह गया है। यह पिछले करीब तीन सालों में बिजनेस ऑप्टिमिज्म का सबसे निचला स्तर है।
कंपनियों के लिए एक बड़ी चिंता ऑपरेटिंग कॉस्ट का बढ़ना है। देश भर के बिजनेसेज को कच्चे माल, एनर्जी, फ्यूल और ट्रांसपोर्टेशन पर अधिक खर्च की उम्मीद है। इसके अलावा, बढ़ती सैलरी भी कंपनियों पर दबाव डाल रही है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कंपनियां इन बढ़ते खर्चों का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पा रही हैं। मार्केट में जबरदस्त कॉम्पिटिशन और प्राइस-सेंसिटिव कस्टमर्स के कारण कंपनियां कीमतें बढ़ाने में संघर्ष कर रही हैं, जिससे सीधे तौर पर उनके प्रॉफिट मार्जिन पर खतरा मंडरा रहा है।
प्रॉफिटेबिलिटी और निवेश की प्राथमिकताएं
हालांकि प्रॉफिटेबिलिटी का ओवरऑल आउटलुक घटकर 15% नेट बैलेंस पर आ गया है, यह अभी भी ग्लोबल एवरेज 9% और इमर्जिंग मार्केट एवरेज 5% से अधिक है। यह दर्शाता है कि भले ही भारतीय कंपनियां साल की शुरुआत की तुलना में कम ऑप्टिमिस्टिक हों, फिर भी वे अपने कई ग्लोबल समकक्षों की तुलना में अधिक मजबूत स्थिति में हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इस सतर्क माहौल के बावजूद कंपनियां अपनी ग्रोथ की योजनाओं को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। प्लान्ड कैपिटल स्पेंडिंग के लिए नेट बैलेंस पिछले पीरियड के 17% से थोड़ा बढ़कर 19% हो गया है। इसके अलावा, रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) के प्रति प्रतिबद्धता मजबूत हुई है, जिसमें स्पेंडिंग इंटेंशन 5% से बढ़कर 12% हो गया है। ये इन्वेस्टमेंट डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सॉल्यूशंस और नए प्रोडक्ट्स के डेवलपमेंट की ओर केंद्रित हैं। यह बताता है कि कंपनियां शॉर्ट-टर्म अर्निंग ग्रोथ की तुलना में लॉन्ग-टर्म एफिशिएंसी को प्राथमिकता दे रही हैं।
एम्प्लॉयमेंट और इन्फ्लेशन का अनुमान
जैसे-जैसे कंपनियां लागत प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं, उनकी हायरिंग की योजनाएं धीमी हो गई हैं। एम्प्लॉयमेंट ग्रोथ के लिए नेट बैलेंस फरवरी के 17% से घटकर जून 2026 में 10% रह गया है। यह इंगित करता है कि धीमी कमाई के अनुमानों से निपटने के दौरान बिजनेस स्टाफ जोड़ने में अधिक सेलेक्टिव हो रहे हैं। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की कंपनियां, सर्विस-सेक्टर फर्मों की तुलना में हायरिंग लेवल बनाए रखने की अपनी क्षमता को लेकर थोड़ी अधिक आशावादी दिख रही हैं।
इस बीच, नॉन-स्टाफ कॉस्ट के लिए इन्फ्लेशन एक्सपेक्टेशंस अक्टूबर 2024 के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। हालांकि, कई ग्लोबल कंपनियों की तुलना में भारतीय कंपनियां ओवरऑल इन्फ्लेशन को लेकर अपेक्षाकृत कम चिंतित हैं। आगे चलकर, निवेशक इस बात पर नजर रख सकते हैं कि कंपनियां बढ़ती इनपुट लागत और सीमित प्राइसिंग पावर वाले माहौल में अपने कैपिटल स्पेंडिंग और डिजिटल पहलों का प्रबंधन कैसे करती हैं। आने वाली तिमाहियों में कॉर्पोरेट परफॉर्मेंस मैनेजमेंट टीमों की लॉन्ग-टर्म ग्रोथ का त्याग किए बिना मार्जिन बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करेगा।
