एक नई बर्न्सटीन (Bernstein) रिपोर्ट के अनुसार, भारत का कृषि क्षेत्र अब मानसून की चाल पर कम निर्भर हो गया है। बेहतर सिंचाई व्यवस्था और नई फसल पैटर्न के चलते खेती में स्थिरता आ रही है।
सिंचाई और फसल विविधीकरण का असर
बरसों से यह माना जाता रहा है कि भारत की कृषि विकास दर काफी हद तक मानसून पर टिकी हुई है। लेकिन, ब्रोकरेज फर्म बर्न्सटीन की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि भारतीय खेती में एक बड़ा ढांचागत बदलाव आया है, जिससे यह बारिश की घट-बढ़ के प्रति पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत हो गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि नहरों, ट्यूबवेल और ड्रिप सिंचाई जैसी सिंचाई प्रणालियों के विस्तार ने किसानों को कम बारिश होने पर भी पानी का बेहतर प्रबंधन करने में मदद की है। इसके साथ ही, किसान अब अलग-अलग फसल पैटर्न अपना रहे हैं। ऐसी फसलें चुन रहे हैं जो उपलब्ध पानी के लिए ज़्यादा उपयुक्त हों या जिनकी क्रांतिक वृद्धि के चरणों में कम पानी की ज़रूरत हो। इस बदलाव से खेती की पैदावार पर पड़ने वाले मानसून के झटकों का असर कम हुआ है। इससे किसानों की आमदनी भी ज़्यादा स्थिर हुई है, जो पहले मानसून की अनिश्चितता से बहुत प्रभावित होती थी।
हाल की सूखी अवधि में भी दिखी मज़बूती
अगर पिछले दस सालों के आंकड़ों को देखें, तो यह बदलाव और भी स्पष्ट हो जाता है। ऐसे दौर, जैसे 2018-19 और 2023-24 में, जब बारिश सामान्य से कम रही, भारत ने खाद्य अनाज उत्पादन में वृद्धि दर्ज की। यह इस बात का सबूत है कि खेती में हुए ढांचागत सुधारों का असर अब कुल उत्पादन पर पड़ रहा है और यह मानसून की सालाना घट-बढ़ से काफी हद तक सुरक्षित हो गया है।
निवेशकों के लिए, यह एक बड़ा संकेत है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था अब भारत के GDP में ज़्यादा स्थिर योगदान दे सकती है। हालांकि, कुल पानी की उपलब्धता के लिए मानसून अभी भी महत्वपूर्ण है, लेकिन बारिश और उत्पादन में गिरावट के बीच कमज़ोर पड़ती कड़ी, ग्रामीण खपत से जुड़ी कंपनियों, जैसे उपभोक्ता वस्तुओं, उर्वरक और ट्रैक्टर बनाने वाली कंपनियों के लिए ज़्यादा अनुमानित नतीजे दे सकती है।
