खर्च करने की आदतें बदलीं
सिर्फ खर्चों में कमी ही नहीं, बल्कि भारतीय घरों के खर्च करने का तरीका भी बदल रहा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और बड़े पेमेंट प्रोसेसर के आंकड़ों के अनुसार, रिटेल क्रेडिट कार्ड ट्रांजैक्शन का औसत टिकट साइज (औसत खर्च) घट रहा है। यह सिर्फ बढ़ी हुई फ्यूल कीमतों का नतीजा नहीं है, बल्कि मिडिल क्लास लोगों के कर्ज प्रबंधन (debt management) में एक बड़े बदलाव का संकेत है। जब घर चलाने के ज़रूरी खर्चे, जैसे कि फ्यूल और एनर्जी, आपकी कमाई का बड़ा हिस्सा ले लेते हैं, तो जो पैसा पहले अपनी मर्जी की चीज़ों और घूमने-फिरने पर खर्च होता था, वह तेजी से खत्म हो जाता है।
बैंकों की मुनाफे पर असर
प्राइवेट बैंकों के लिए ज़्यादा ब्याज वाले 'रिवॉल्विंग क्रेडिट' (जहाँ आप बिल का पूरा भुगतान नहीं करते और बकाया राशि पर ब्याज लगता है) पर निर्भरता अब एक बड़ा जोखिम बन गई है। पिछले समय में, जब ग्रोथ अच्छी थी, तब HDFC Bank और ICICI Bank जैसे बैंक क्रेडिट कार्ड डेट पर मिलने वाले ब्याज से खूब कमा रहे थे। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। लोग अपनी पूरी बकाया राशि का भुगतान कर रहे हैं, जिससे बैंकों को कम नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) मिल रहा है। जहाँ लोग पूरा बिल भरते हैं (transactors), उनसे मिलने वाला फायदा उन लोगों से काफी कम होता है जो बकाया राशि पर ब्याज देते हैं (revolvers)। जैसे-जैसे 'रिवॉल्विंग' सेगमेंट में ग्रोथ धीमी हो रही है, एनालिस्ट्स अपनी कमाई के अनुमानों को कम कर रहे हैं। साथ ही, अगर महंगाई ऐसे ही बनी रही तो क्रेडिट कार्ड डिफॉल्टर (कर्ज न चुकाने वाले) बढ़ने का भी खतरा है।
आगे का रास्ता और जोखिम
बाजार अभी जिस एक बड़े जोखिम को नज़रअंदाज़ कर रहा है, वह है भारतीय ग्राहकों का ब्याज दरों के प्रति सेंसेटिव होना। सेंट्रल बैंक अभी भी सावधानी बरत रहा है, जिससे बिना गारंटी वाले कर्ज (unsecured debt) को चुकाने की लागत ज़्यादा बनी हुई है। एक बड़ी कमजोरी यह भी है कि लोग अब रिटेल क्रेडिट पर ज़्यादा निर्भर हो रहे हैं, जो कि उनकी असल कमाई (real wage growth) से ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रहा है। इसके अलावा, 2023 की तरह अभी बैंकों के पास ज़्यादा लिक्विडिटी (पैसे की उपलब्धता) नहीं है। नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) भी अब लोन देने में ज़्यादा सचेत हो गई हैं, जिसका मतलब है कि 'बाय नाउ, पे लेटर' (BNPL) जैसे ऑप्शन अब पहले जैसे मददगार नहीं रहे। अगर फ्यूल की कीमतें इसी स्तर पर बनी रहीं, तो लोग अपनी मर्जी की खरीदारी की जगह कर्ज चुकाने को ज़्यादा प्राथमिकता देंगे। इससे बैंकों को और भी ज़्यादा सचेत होकर लोन देना पड़ेगा, जो क्रेडिट कार्ड की पहुंच को और कम कर देगा।
सेक्टर का नज़रिया
इंस्टीट्यूशनल एनालिस्ट्स अब टियर-1 और टियर-2 शहरों के खर्च के पैटर्न पर ध्यान दे रहे हैं। जहाँ शहरी खपत (urban consumption) पर महंगाई का असर ज़्यादा दिख रहा है, वहीं ग्रामीण मांग (rural demand) अभी भी थोड़ी ज़्यादा स्थिर है। आने वाली तिमाही के नतीजे (quarterly disclosures) यह साफ कर देंगे कि यह गिरावट सिर्फ कुछ समय के लिए महंगाई के कारण आई है या भारतीय उपभोक्ता एक लंबी मंदी के दौर में जाने वाला है। निवेशकों को बिना गारंटी वाली संपत्ति (unsecured assets) के लिए बैंकों द्वारा किए जाने वाले प्रोविजनिंग (पैसा अलग रखना) पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि यह रिटेल ग्राहकों के भरोसे का सबसे बड़ा पैमाना होगा।
