आज भारतीय वित्तीय बाज़ारों में शानदार तेज़ी देखने को मिली। तेल की कीमतों में गिरावट और भू-राजनीतिक तनाव कम होने के संकेतों के चलते, देश के बेंचमार्क 10-साल के बॉन्ड यील्ड में गिरावट आई और रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत हुआ।
Detailed Coverage
तेल की कीमतों में नरमी का असर
वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, खासकर अमेरिका और ईरान के बीच, कम होने के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में भारी गिरावट आई है। यह गिरावट लगभग 4% रही, जिससे कीमतें $93 प्रति बैरल के स्तर पर आ गईं। भारत अपनी कच्चे तेल की 85% से अधिक ज़रूरतों का आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में यह कमी देश के व्यापार घाटे (Trade Balance) और महंगाई (Inflation) के लिहाज़ से बहुत राहत भरी खबर है।
बॉन्ड यील्ड और रुपये में मजबूती
इस अनुकूल स्थिति का सीधा असर भारतीय वित्तीय बाज़ारों पर दिखा। 10-साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड में 5 बेसिस पॉइंट की गिरावट दर्ज की गई और यह 6.7753% पर आ गया, जो पिछले दिन 6.8253% था। बॉन्ड यील्ड का गिरना यह दर्शाता है कि निवेशकों के बीच बॉन्ड की मांग बढ़ी है और उनकी कीमतें ऊपर गई हैं।
इसके साथ ही, भारतीय रुपया भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 41 पैसे मजबूत हुआ। दिन की शुरुआत में रुपया 96.15 पर खुला, जबकि पिछले दिन यह 96.56 पर बंद हुआ था। यह लगभग दो महीनों में रुपये का सबसे मजबूत प्रदर्शन है, जिसका श्रेय कम ऊर्जा लागत और विदेशी पूंजी के बढ़ते प्रवाह (Foreign Capital Inflows) को जाता है।
आगे क्या? RBI और Fed की मीटिंग पर नज़र
फिलहाल, बाज़ार की निगाहें अब केंद्रीय बैंकों की आगामी बैठकों पर टिकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि अमेरिकी फेडरल रिज़र्व (US Federal Reserve) इस हफ़्ते होने वाली अपनी बैठक में ब्याज दरों को अपरिवर्तित रखेगा। वहीं, भारत में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अगले महीने अपनी द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा (Monetary Policy Review) करेगा। ज़्यादातर विश्लेषकों का मानना है कि RBI अपनी अगस्त की बैठक में रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रख सकता है।
हालांकि, तेल की कीमतों में आई यह नरमी फिलहाल राहत दे रही है, लेकिन बाज़ार की चाल वैश्विक ऊर्जा कीमतों की स्थिरता और केंद्रीय बैंकों के फैसलों पर निर्भर करेगी। अगर तेल की कीमतें लगातार गिरती रहती हैं, तो यह घरेलू खुदरा महंगाई (Retail Inflation) को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है, जो सीधे तौर पर RBI के ब्याज दरों पर फैसले को प्रभावित करती है। इसके विपरीत, अगर कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेज़ी आती है या फेडरल रिज़र्व कोई अप्रत्याशित कदम उठाता है, तो बाज़ार में अस्थिरता बढ़ सकती है। निवेशकों की नज़रें अब आने वाले महंगाई के आंकड़ों और RBI के आधिकारिक बयानों पर रहेंगी।
