पिछले दो हफ्तों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय सरकारी बॉन्ड्स में **₹2 बिलियन** का निवेश किया है। यह उछाल हाल ही में हुए टैक्स और रेगुलेटरी बदलावों के बाद आया है, जिनका मकसद विदेशी भागीदारी को बढ़ावा देना है। हालांकि बॉन्ड में निवेश बढ़ रहा है, लेकिन विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों की बिकवाली जारी रखे हुए हैं, जिसके चलते कुल मिलाकर स्थानीय सिक्योरिटीज से पैसा निकल रहा है।
क्या हुआ?
भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा 5 जून को घोषित नीतिगत बदलावों के बाद से भारतीय सरकारी बॉन्ड (Indian Sovereign Debt) में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी काफी बढ़ गई है। इन घोषणाओं के बाद के दो हफ्तों में, फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने 'फुल्ली एक्सेसिबल रूट' (FAR) के तहत आने वाले बॉन्ड्स में $2 बिलियन का भारी निवेश किया है। यह डिमांड में आई तेजी इसलिए भी खास है क्योंकि यह पिछले आठ महीनों में हुए कुल इनफ्लो के बराबर है। इस खरीदारी के दबाव का असर 10-साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड पर भी दिख रहा है, जो 4 जून के स्तर से 22 बेसिस पॉइंट घटकर 6.77% पर आ गया है।
निवेशक क्यों खरीद रहे हैं भारतीय बॉन्ड्स?
नीतियों में ढील देने का मुख्य उद्देश्य भारतीय सरकारी बॉन्ड्स को अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए और अधिक आकर्षक बनाना है। सरकार ने इन निवेशों पर लॉन्ग-टर्म और शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स दोनों हटा दिए हैं, साथ ही विदहोल्डिंग टैक्स (withholding tax) को भी खत्म कर दिया है। वैश्विक निवेशकों के लिए, ये बदलाव निवेश की लागत को कम करते हैं और प्रक्रिया को सरल बनाते हैं।
इसके अलावा, यह उम्मीद भी बढ़ रही है कि भारतीय सरकारी बॉन्ड्स को प्रमुख ग्लोबल इंडेक्स, जैसे कि ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स (Bloomberg Global Aggregate Bond Index) में शामिल किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है, तो यह उन ग्लोबल फंड्स से भारी पैसिव निवेश को आकर्षित कर सकता है जो इन इंडेक्स को ट्रैक करते हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि इस तरह के समावेश से अगले 10 महीनों की अवधि में $20 बिलियन से $30 बिलियन का अतिरिक्त निवेश आ सकता है।
'फुल्ली एक्सेसिबल रूट' (FAR) को समझना
'फुल्ली एक्सेसिबल रूट' (Fully Accessible Route) सरकारी सिक्योरिटीज की एक विशेष श्रेणी है जो विदेशी निवेशकों के लिए बिना किसी निवेश सीमा के खुली है। बॉन्ड की अन्य श्रेणियों के विपरीत, जिनमें विदेशी होल्डिंग्स पर कैप हो सकता है, FAR बॉन्ड्स नॉन-रेसिडेंट्स को अपनी इच्छानुसार जितनी चाहें उतनी खरीदारी करने की अनुमति देते हैं। टैक्स हटाने और इन बॉन्ड्स के लिए रेगुलेशन को सुव्यवस्थित करके, भारत खुद को विदेशी संस्थागत पूंजी के लिए एक अधिक सुलभ बाजार के रूप में स्थापित कर रहा है।
डेट और इक्विटी के बीच का अंतर
जहां एक ओर बॉन्ड मार्केट विदेशी पूंजी को आकर्षित कर रहा है, वहीं भारतीय शेयर बाजार की कहानी अलग है। विदेशी निवेशकों ने जून में $5.55 बिलियन की नेट बिकवाली के साथ भारतीय इक्विटी से पैसा निकालना जारी रखा है। यह एक व्यापक प्रवृत्ति को दर्शाता है, जहां वैश्विक निवेशक अपने पोर्टफोलियो को रीबैलेंस कर रहे होंगे, उभरते बाजार के शेयरों से पैसा निकालकर सुरक्षित सरकारी कर्ज में लगा रहे होंगे, या शायद हाल के इक्विटी बाजार के प्रदर्शन से मुनाफा बुक कर रहे होंगे।
आगे क्या देखना है?
निवेशकों को तीन प्रमुख कारकों पर नजर रखनी चाहिए। पहला, भारतीय रुपये (Indian Rupee) की स्थिरता महत्वपूर्ण है, क्योंकि मुद्रा में उतार-चढ़ाव विदेशी बॉन्डधारकों के लिए वास्तविक रिटर्न को प्रभावित कर सकता है। दूसरा, इन इनफ्लो की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि वैश्विक ब्याज दरें स्थिर रहती हैं या नहीं। अंत में, ग्लोबल इंडेक्स में भारतीय बॉन्ड्स के शामिल होने की समय-सीमा के बारे में कोई भी आधिकारिक घोषणा एक महत्वपूर्ण देखने लायक बात होगी, क्योंकि यह बड़े पैमाने पर विदेशी फंड इनफ्लो की अगली लहर को निर्धारित करेगा।
