क्यों आई बॉन्ड मार्केट में गिरावट?
फिक्स्ड-इनकम इन्वेस्टर्स (Fixed-income investors) भारतीय सरकारी सिक्योरिटीज में तेज करेक्शन देख रहे हैं। बाहरी मैक्रो प्रेशर (Macro pressures) उस उम्मीद पर भारी पड़ रहे थे जिसने पिछले हफ्ते रैली को हवा दी थी। बेंचमार्क 6.48% 2035 बॉन्ड का यील्ड 7.025% के करीब पहुंच गया है, जिससे पिछले लगभग दो महीनों की बेस्ट वीकली परफॉरमेंस (Weekly performance) में आई तेजी का एक हिस्सा खत्म हो गया है। यह अस्थिरता दर्शाती है कि मार्केट एनर्जी-ड्रिवेन इन्फ्लेशन (Energy-driven inflation) के प्रति कितनी संवेदनशील है, खासकर जब सेंट्रल बैंक अपनी अगली मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (Monetary Policy Committee) की मीटिंग के लिए तैयारी कर रहा है, जो 5 जून को होनी है।
एनर्जी-इम्पोर्ट का बढ़ता बोझ
यह मौजूदा स्थिति सीधे तौर पर ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतों से जुड़ी है, जो मध्य पूर्व में क्षेत्रीय संघर्षों के बढ़ने के कारण $93 प्रति बैरल के करीब ट्रेड कर रहा है। भारत जैसी इकोनॉमी के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा ग्लोबल मार्केट से लेती है, यह प्राइसिंग एनवायरनमेंट (Pricing environment) डायरेक्ट करंट अकाउंट डेफिसिट (Current account deficit) पर टैक्स की तरह है। फाइनेंशियल मॉडल्स (Financial models) बताते हैं कि क्रूड प्राइस में मामूली सी भी लगातार बढ़ोतरी सालाना इम्पोर्ट बिल पर सैकड़ों अरब रुपये का बोझ डाल सकती है। ऐसे में, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) को करेंसी स्टेबिलिटी (Currency stability) बनाए रखने और महंगाई को कंट्रोल करने के लिए ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रखना पड़ सकता है।
स्ट्रक्चरल रिस्क और मंदी की आशंका
सेंट्रल बैंक एक मुश्किल दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां ग्रोथ के आंकड़े (Growth metrics), खासकर आने वाले Q4 GDP डेटा, रिस्ट्रिक्टिव मॉनेटरी पॉलिसी (Restrictive monetary policy) की जरूरत के विपरीत हो सकते हैं। हालांकि इकोनॉमिस्ट्स (Economists) का मानना है कि इस मीटिंग में रेपो रेट (Repo rate) स्थिर रहेगा, लेकिन Standard Chartered और ANZ जैसे संस्थानों के नेतृत्व वाले अल्पसंख्यक वर्ग का मानना है कि इन्फ्लेशन के खतरे को कम आंका जा रहा है। इस स्थिति को और जटिल बना रहा है आने वाले मॉनसून (Monsoon) का अनिश्चित चक्र; अगर सामान्य बारिश के पैटर्न से कोई भी विचलन हुआ तो खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे सप्लाई-साइड इन्फ्लेशन (Supply-side inflation) का एक दोहरा झटका लग सकता है जिसे सेंट्रल बैंक केवल इंटरेस्ट रेट एडजस्टमेंट (Interest rate adjustments) से आसानी से कंट्रोल नहीं कर पाएगा। वित्त मंत्रालय (Finance Ministry) के अपने हालिया खुलासे भी इस चिंता को दर्शाते हैं, जो स्वीकार करते हैं कि एनर्जी की अस्थिरता और संभावित एग्रीकल्चरल स्ट्रेस (Agricultural stress) का संयोजन 2027 के फिस्कल ईयर (Fiscal year) के बाकी बचे समय के लिए फिस्कल कंसॉलिडेशन (Fiscal consolidation) योजनाओं को पटरी से उतार सकता है।
आगे का रास्ता
अब इन्वेस्टर्स सेंट्रल बैंक के अपडेटेड इन्फ्लेशन (Inflation) और ग्रोथ (Growth) के पूर्वानुमानों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। मार्केट इस बात के संकेत खोज रहा है कि मॉनेटरी अथॉरिटीज (Monetary authorities) घरेलू खपत का समर्थन करने की आवश्यकता और इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन की वास्तविकता के बीच कैसे संतुलन बनाएंगी। 5 जून की घोषणा तक, ट्रेडिंग एक्टिविटी (Trading activity) में एक डिफेंसिव बायस (Defensive bias) के साथ रेंज-बाउंड (Range-bound) रहने की उम्मीद है, क्योंकि पार्टिसिपेंट्स ऐसे माहौल में ड्यूरेशन रिस्क (Duration risk) लेने से बचेंगे जहां ग्लोबल एनर्जी प्राइस लोकल बॉन्ड परफॉर्मेंस का मुख्य निर्धारक बने रहेंगे।
