तेल और महंगाई का सीधा कनेक्शन
सरकारी बॉन्ड यील्ड में यह बढ़त साफ दर्शाती है कि बाज़ार जोखिमों को फिर से आंक रहा है। ऊर्जा (Energy) पर आधारित आयात बिल भारी होने से बॉन्ड ट्रेडर्स अब ज़्यादा रिटर्न की मांग कर रहे हैं। मध्य-पूर्व (Middle East) में भू-राजनीतिक तनावों ने भारतीय बॉन्ड बाज़ार की सुस्ती को खत्म कर दिया है और अब ध्यान डोमेस्टिक ग्रोथ से हटकर करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) की चिंता पर चला गया है।
RBI की पॉलिसी का बड़ा सवाल
RBI की अगली पॉलिसी को लेकर बाज़ार की राय बंटी हुई है। ज़्यादातर अनुमान यही है कि रेपो रेट 5.25% पर स्थिर रहेगा, लेकिन कुछ बड़े संस्थान एक सरप्राइज रेट हाइक की आशंका भी जता रहे हैं। अगर RBI ऐसा करता है, तो यह रुपये (Rupee) को गिरने से बचाने की एक कोशिश होगी, क्योंकि बढ़ती ग्लोबल यील्ड और रिस्क-ऑफ सेंटिमेंट के चलते रुपया दबाव में है। अगर गवर्नर शक्तिकांत दास और मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) सख्त रुख अपनाते हैं, तो यील्ड कर्व के बीच वाले हिस्से में बिकवाली देखने को मिल सकती है, जो यह संकेत देगा कि सस्ते पैसे का दौर खत्म हो गया है।
बॉन्ड मार्केट के लिए खतरे की घंटी
भारतीय सरकारी बॉन्ड की स्थिरता पर दोहरे खतरे मंडरा रहे हैं। एनर्जी मार्केट की वोलेटिलिटी के अलावा, कोर इन्फ्लेशन (Core Inflation) का लगातार बढ़ना RBI के लिए ग्रोथ को नुकसान पहुंचाए बिना कोई कदम उठाना मुश्किल बना रहा है। पिछले कुछ सालों के विपरीत, जब भारत मजबूत कैपिटल इनफ्लो (Capital Inflows) पर निर्भर रह सकता था, मौजूदा ग्लोबल माहौल में ऊंचे अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड (US Treasury Yields) के चलते इमर्जिंग मार्केट डेट (Emerging Market Debt) कम आकर्षक लग रहा है। अगर तेल की कीमतें इसी स्तर पर बनी रहती हैं, तो इस फाइनेंशियल ईयर के लिए सरकार के फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) टारगेट पर क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की कड़ी नज़र रहेगी, जिससे क्रेडिट स्प्रेड (Credit Spreads) बढ़ सकते हैं। साथ ही, रुपये में लगातार गिरावट RBI को लिक्विडिटी (Liquidity) टाइट करने पर मजबूर कर सकती है, जिससे मौजूदा बॉन्ड पोर्टफोलियो की वैल्यूएशन (Valuation) पर सीधा असर पड़ेगा।
आगे की राह
आने वाले दिनों में बाज़ार की दिशा RBI द्वारा फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए जारी किए जाने वाले इन्फ्लेशन प्रोजेक्शन (Inflation Projections) पर निर्भर करेगी। अगर RBI इंपोर्टेड इन्फ्लेशन से निपटने के लिए 'हायर-फॉर-लॉन्गर' (Higher-for-Longer) यानी ऊंची ब्याज दरें लंबे समय तक बनाए रखने का संकेत देता है, तो 10-साल की यील्ड 7.10% के रेजिस्टेंस लेवल को पार कर सकती है। इसके विपरीत, अगर ग्रोथ सपोर्ट को लेकर कोई नरमी दिखाई जाती है, तो बाज़ार में तेजी आ सकती है, हालांकि यह तेजी ब्रेंट क्रूड की कीमतों में और बढ़ोतरी होने पर अचानक पलट सकती है।
