लिक्विडिटी का प्रेशर कुकर
मार्केट पार्टिसिपेंट्स इस वक्त एक दोहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जियोपॉलिटिकल अस्थिरता है, तो दूसरी तरफ घरेलू सप्लाई को खपाने का दबाव। बॉन्ड यील्ड में स्थिरता ऊपरी तौर पर दिख रही है, लेकिन अंदरूनी तौर पर मार्केट एक बड़े ड्यूरेशन रिस्क (Duration Risk) के लिए तैयार हो रहा है। राज्य सरकारों के बॉन्ड की ₹24,100 करोड़ की तत्काल सप्लाई, यील्ड कर्व (Yield Curve) पर दबाव बनाने के लिए काफी है, और यह तब हो रहा है जब RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक शुरू भी नहीं हुई है।
पॉलिसी का नया मोड़?
हालांकि ज्यादातर एनालिस्ट्स (Analysts) का मानना है कि RBI ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा, लेकिन फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए महंगाई के अनुमान एक बड़ा अनिश्चित कारक बने हुए हैं। सेंट्रल बैंक पर इस बात का दबाव है कि वह घरेलू ग्रोथ को बनाए रखते हुए, किसी भी ऐसे बाहरी कारक से आने वाली महंगाई को संभाले जो कच्चे तेल की सप्लाई को बाधित कर सकता है (खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास के हालात)। अगर RBI ग्रोथ अनुमानों को कम करता है और मौजूदा दरों को बनाए रखता है, तो यील्ड कर्व के और फ्लैट होने की उम्मीद है, क्योंकि निवेशक रिस्क वाले क्रेडिट इंस्ट्रूमेंट्स (Credit Instruments) की जगह सरकारी सिक्योरिटीज को तरजीह देंगे।
स्ट्रक्चरल रिस्क और मंदी की आशंका
रिस्क मैनेजमेंट के नजरिए से, सबसे बड़ी चिंता सप्लाई-ड्रिवेन (Supply-driven) बिकवाली के प्रति लॉन्ग-एंड टेन्योर (Long-end Tenor) की संवेदनशीलता है। ₹34,000 करोड़ के नए 10-साल के सरकारी बॉन्ड की आने वाली नीलामी इंस्टीट्यूशनल डिमांड (Institutional Demand) के लिए एक अहम परीक्षा होगी। अगर बिड-टू-कवर रेशियो (Bid-to-cover Ratio) कमजोर होता है, तो यह संकेत देगा कि RBI को रुपया बचाने के लिए सख्ती करनी पड़ सकती है, ऐसे में मार्केट ड्यूरेशन को लेकर सहज नहीं है। पिछली बार की तरह इस बार बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी (Liquidity) उतनी आसानी से उपलब्ध नहीं है, जिससे यह सरकारी उधारी इन बड़े ट्रेंचों (Tranches) के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है। निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो पर मार्जिन कंप्रेशन (Margin Compression) से सावधान रहना चाहिए, अगर RBI फिस्कल स्लिपेज (Fiscal Slippage) को लेकर 'वेट-एंड-सी' (Wait-and-see) का रुख अपनाता है।
आगे का रास्ता
भविष्य की चालें, रेट डिसीजन (Rate Decision) से ज्यादा सेंट्रल बैंक की ओर से न्यूट्रल रेट (Neutral Rate) पर आने वाली कमेंट्री से तय होंगी। मार्केट पार्टिसिपेंट्स को गवर्नर के बयान के टोन पर ध्यान देना चाहिए, ताकि वर्तमान पॉज (Pause) की अवधि को लेकर कोई संकेत मिल सके। अगर कमेटी इस फाइनेंशियल ईयर के बाकी समय के लिए रेट कट (Rate Cut) की संभावना को पूरी तरह से खारिज कर देती है, तो फ्रंट-एंड यील्ड (Front-end Yield) में एडजस्टमेंट (Adjustment) होना तय है, जो अनिश्चितता के इस दौर में बाहर बैठे इंस्टीट्यूशनल पोर्टफोलियो के लिए एंट्री पॉइंट (Entry Point) बना सकता है।
