भारतीय बॉन्ड मार्केट में आज हलचल देखने को मिली। 10-Year सरकारी बॉन्ड यील्ड 6.72% के स्तर पर पहुँच गया, जो पिछले डेढ़ महीने का सबसे ऊंचा स्तर है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ी और भू-राजनैतिक तनावों ने महंगाई को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
बॉन्ड यील्ड में क्यों आई तेज़ी?
8 जुलाई को भारतीय बॉन्ड मार्केट में बड़ी हलचल देखी गई। 10-Year सरकारी बॉन्ड यील्ड 6.7204% के पार चला गया, जो 19 जून के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। यील्ड का बढ़ना यह दर्शाता है कि बॉन्ड की कीमतें गिरी हैं, क्योंकि आमतौर पर यील्ड और कीमत एक-दूसरे के विपरीत चलते हैं। मार्केट पार्टिसिपेंट्स अब महंगाई को लेकर पहले से ज़्यादा सतर्क हो गए हैं।
कच्चे तेल का कितना असर?
इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह है ग्लोबल मार्केट में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों का $76 प्रति बैरल के पार जाना। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण एनर्जी की कीमतों में यह तेज़ी आई है। भारत बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए कच्चे तेल के दाम बढ़ने से देश में महंगाई बढ़ने का डर सता रहा है। जब महंगाई बढ़ने की उम्मीद होती है, तो निवेशक बॉन्ड पर ज़्यादा यील्ड की मांग करते हैं ताकि वे अपनी परचेजिंग पावर में होने वाले नुकसान की भरपाई कर सकें।
ग्लोबल मार्केट का भी असर
यह सिर्फ़ भारत की बात नहीं है, ग्लोबल मार्केट में भी यही रुझान दिख रहा है। एनर्जी की बढ़ती कीमतों और आर्थिक अनिश्चितता के कारण अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड भी 4.5650% पर पहुँच गई है। अमेरिकी यील्ड में होने वाले बदलाव अक्सर ग्लोबल कैपिटल फ्लो को प्रभावित करते हैं और भारत जैसे उभरते बाजारों पर भी दबाव डाल सकते हैं।
राहत की उम्मीदें?
इन चुनौतियों के बावजूद, कुछ स्ट्रक्चरल फैक्टर बॉन्ड मार्केट को सहारा दे रहे हैं। रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) का फुली एक्सेसिबल रूट (Fully Accessible Route), जो विदेशी निवेशकों को कुछ सरकारी सिक्योरिटीज बिना किसी लिमिट के खरीदने की अनुमति देता है, उसमें लगातार अच्छी भागीदारी देखी जा रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले एक महीने में इस रूट से करीब $4 बिलियन का इनफ्लो हुआ है, जो बाहरी अस्थिरता से कुछ हद तक राहत दे रहा है।
आगे क्या देखें?
निवेशकों के लिए, अब कच्चे तेल की कीमतों का रुख और उसका भारत के कंज्यूमर प्राइस इन्फ्लेशन (CPI) डेटा पर पड़ने वाला असर देखना महत्वपूर्ण होगा। अगर तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहीं, तो मार्केट पार्टिसिपेंट्स को इंटरेस्ट रेट पॉलिसी को लेकर अपनी उम्मीदें फिर से बनानी पड़ सकती हैं। आने वाले घरेलू महंगाई के आंकड़े और ग्लोबल सेंट्रल बैंकों से मिलने वाले संकेत महत्वपूर्ण होंगे।
