यूरोपियन यूनियन (EU) के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) के चलते छोटे और मझोले उद्योगों (MSMEs) पर पड़ रहे भारी बोझ को कम करने के लिए भारत सरकार एक बड़ी पहल करने जा रही है। सरकार इन व्यवसायों के लिए कंप्लायंस (अनुपालन) लागत का **90%** तक वहन करेगी। यह नया नियम 1 जनवरी, 2026 से लागू होने वाला है।
MSMEs पर पड़ रहा भारी बोझ
यूरोपियन यूनियन के नए कार्बन टैक्स, जिसे CBAM कहा जा रहा है, के कारण भारतीय छोटे और मझोले उद्योगों (MSMEs) पर बड़ा आर्थिक और तकनीकी दबाव आ रहा है। उद्योग के सूत्रों का कहना है कि प्रत्येक MSME यूनिट को अकेले कार्बन टैक्स के लिए सालाना ₹15 लाख से ₹20 लाख तक का खर्चा उठाना पड़ सकता है। इन कंपनियों के पास अक्सर जरूरी तकनीकी जानकारी और वित्तीय साधन नहीं होते कि वे EU के नियमों के अनुसार अपने उत्पादों में मौजूद कार्बन उत्सर्जन (embedded emissions) को ट्रैक और रिपोर्ट कर सकें। यह नियम 1 जनवरी, 2026 से लागू हो रहा है, और यूके भी 2027 तक अपना खुद का CBAM लागू करने की योजना बना रहा है।
डिफ़ॉल्ट वैल्यू और मार्क-अप का चक्कर
CBAM के तहत, निर्यातकों को अपने माल में मौजूद कार्बन उत्सर्जन का विवरण देने वाले सर्टिफिकेट जमा करने होंगे। अगर वास्तविक डेटा उपलब्ध नहीं होता है, तो आयातकों को यूरोपियन कमीशन द्वारा प्रदान की गई 'डिफ़ॉल्ट वैल्यू' का उपयोग करना होगा। इन डिफ़ॉल्ट वैल्यू पर एक मार्क-अप लगेगा: 2026 में 10%, 2027 में 20%, और 2028 से 30% तक बढ़ जाएगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि कम अनुमानित उत्सर्जन की भी भरपाई हो सके। खैतान एंड कंपनी के पार्टनर आयुष ए मेहरात्रा के अनुसार, ये फिक्स्ड कंप्लायंस लागतें बड़ी कंपनियों की तुलना में MSMEs को बहुत ज्यादा प्रभावित करती हैं, जिससे EU मार्केट में उनकी प्राइस कॉम्पिटिटिवनेस (कीमत प्रतिस्पर्धा) कम हो सकती है।
भारत पर पड़ने वाला सेक्टर-वार असर
विश्लेषणों से पता चलता है कि CBAM-कवर्ड कमोडिटीज में भारत से होने वाले आयात में गिरावट आ सकती है। लोह और इस्पात (Iron and Steel) क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित होने की आशंका है, जिससे EU आयात में अनुमानित 24% की कमी आ सकती है। इसके बाद फर्टिलाइजर्स (Fertilizers), एल्यूमीनियम उत्पाद (Aluminum Products) और मेटल उत्पाद (Metal Products) आते हैं। भारत के लोह और इस्पात के वैश्विक निर्यात में 5.7% की कमी आने की उम्मीद है, जो चीन के अनुमानित 1.2% की कमी से काफी ज्यादा है। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) की एक रिपोर्ट के अनुसार, हालांकि CBAM का EU के साथ भारत के व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, लेकिन वास्तविक कार्बन उत्सर्जन पर इसका प्रभाव नगण्य और मापना मुश्किल है।
