भारत के बदलते वर्कफोर्स (workforce) की तस्वीर चौंकाने वाली है। 2025 के 'पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे' (PLFS) के लेटेस्ट आंकड़े बताते हैं कि जहां एक तरफ महिलाओं की कमाई पुरुषों से तेज रफ्तार से बढ़ी है और वे फॉर्मल सैलरी वाली नौकरियों में ज्यादा आ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ आय का बड़ा गैप अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
फॉर्मल सेक्टर में तरक्की, पर बराबरी की चाल धीमी
PLFS के डेटा के अनुसार, सैलरी वाली नौकरियों में महिलाओं की कमाई में 7.2% की जोरदार बढ़ोतरी हुई, जो पुरुषों की 5.8% की ग्रोथ से कहीं ज्यादा है। इसके साथ ही, इन अच्छी नौकरियों में महिलाओं की हिस्सेदारी भी बढ़कर 18.2% हो गई है, जो पिछले साल (2024) के 16.6% से ज्यादा है। यह दिखाता है कि कुछ महिलाएं बेहतर जॉब्स की ओर बढ़ रही हैं।
लेकिन, यह तेज ग्रोथ बराबरी का संकेत नहीं है। सैलरी वाली भूमिकाओं में, महिलाएं अभी भी पुरुषों की कमाई का सिर्फ 76% ही कमा पाती हैं। यह अंतर 2022 से लगभग वैसा ही है। स्थिति और भी गंभीर सेल्फ-एम्प्लॉयमेंट (self-employment) में है, जहां महिलाएं पुरुषों की कमाई का केवल 36% हिस्सा कमा पाती हैं। कैजुअल लेबर (casual labour) में भी यह गैप 69% पर है, हालांकि इसमें थोड़ी सुधार हुआ है।
अनौपचारिक क्षेत्र (Informal Sector) में धीमी रफ्तार, बढ़ती खाई
वहीं, 'एनुअल सर्वे ऑफ अनइनकॉर्पोरेटेड सेक्टर एंटरप्राइजेज' (ASUSET) के 2025 के आंकड़े एक अलग कहानी कहते हैं। भारत का अनौपचारिक क्षेत्र, जो देश के ज्यादातर वर्कर्स को रोजगार देता है, में बिजनेस और नौकरियां तो बढ़ी हैं, लेकिन इसकी आर्थिक ग्रोथ धीमी पड़ती दिख रही है।
इस सेक्टर में वेज ग्रोथ (wage growth) घटकर महज 3.9% रह गई है, जो पिछले 13% के आंकड़े से आधे से भी कम है। जॉब क्रिएशन (job creation) की रफ्तार भी काफी कम हुई है, जिसने इस बार 74.5 लाख नई नौकरियां पैदा कीं, जबकि पहले यह 1.1 करोड़ के पार थी। यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब देश की ओवरऑल GDP ग्रोथ 7.5% से 7.8% रहने का अनुमान है। फॉर्मल सेक्टर की 9.2% की वेज ग्रोथ के मुकाबले अनौपचारिक सेक्टर की 3.9% की ग्रोथ, इकोनॉमी के दो हिस्सों के बीच बढ़ती खाई को साफ दर्शाती है।
बड़ी चुनौतियां और आगे का रास्ता
ऐतिहासिक रूप से, भारतीय लेबर मार्केट में जेंडर वेज गैप (gender wage gap) एक आम समस्या रही है, जिसमें महिलाएं अक्सर अनौपचारिक और सेल्फ-एम्प्लॉयमेंट में होती हैं, जिससे उनकी औसत आय कम रहती है।
2025 में ग्रामीण लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट (labour force participation rate) में गिरावट और महिलाओं में यूथ अनएम्प्लॉयमेंट (youth unemployment) का थोड़ा बढ़ना भी चिंताजनक है। ग्लोबल लेवल पर भी, जहां कुछ लोग भारत में पे गैप के तेजी से कम होने की बात कह रहे हैं, वहीं दूसरे एनालिस्ट्स का मानना है कि जेंडर पैरिटी (gender parity) आने में सदियाँ लग सकती हैं।
ASUSET के आंकड़े अनौपचारिक क्षेत्र की स्ट्रक्चरल प्रॉब्लम्स (structural problems) जैसे टेक्नोलॉजी और क्रेडिट तक सीमित पहुंच को भी उजागर करते हैं, जो प्रोडक्टिविटी (productivity) और वेजेज को बढ़ा नहीं पा रहे हैं।
भारत का 2026 का इकोनॉमिक आउटलुक (economic outlook) मजबूत दिख रहा है, लेकिन PLFS और ASUSET के डेटा से साफ है कि इस ग्रोथ का फायदा सबको बराबर नहीं मिलेगा। पुरुषों और महिलाओं के बीच लगातार बना हुआ कमाई का गैप, खासकर सेल्फ-एम्प्लॉयमेंट में, और संघर्ष करता अनौपचारिक क्षेत्र, ये दिखाते हैं कि स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स (structural reforms) बहुत जरूरी हैं। इनकी मदद से ही महिलाओं की कमाई में तेज ग्रोथ को असली इकोनॉमिक इक्वालिटी (economic equality) में बदला जा सकता है और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (informal economy) भी देश की समृद्धि में ज्यादा योगदान दे सकती है।