थोक महंगाई में 38 महीनों का रिकॉर्ड
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मार्च में होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) बढ़कर 3.88% पर आ गया है। यह फरवरी के 2.13% के मुकाबले एक बड़ी छलांग है और पिछले 38 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। इससे संकेत मिलता है कि कुछ समय की नरमी के बाद लागत दबाव (cost pressures) फिर से लौट आया है।
कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई मुश्किलें
WPI में इस तेजी का सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल (crude oil) और प्राकृतिक गैस की कीमतों में आया जबरदस्त उछाल है। इस सेक्टर में महंगाई मार्च में बढ़कर 35.98% हो गई, जबकि फरवरी में इसमें 2.56% की गिरावट देखी गई थी। अकेले कच्चे तेल की कीमतों में महंगाई 51.57% तक बढ़ गई, जबकि पिछले महीने यह 1.29% गिरी थी।
ईंधन और तैयार माल पर भी असर
ईंधन और बिजली (fuel and power) की महंगाई भी फरवरी की गिरावट के बाद मार्च में सुधरकर 1.05% पर आ गई। पेट्रोल की कीमतों में 2.5% और हाई-स्पीड डीजल की महंगाई में 3.26% की बढ़ोतरी हुई। सबसे अहम बात, विनिर्मित वस्तुओं (manufactured goods) के दाम, जो WPI का सबसे बड़ा हिस्सा हैं, फरवरी के 2.92% से बढ़कर मार्च में 3.39% हो गए। यह दिखाता है कि कच्चे माल और ऊर्जा की बढ़ती लागत अब फैक्ट्रियों के दामों में भी झलकने लगी है, खासकर टेक्सटाइल, केमिकल, लेदर और मेटल जैसे सेक्टर्स में।
रिटेल महंगाई पर भी पड़ेगा असर?
जहां होलसेल महंगाई बढ़ी है, वहीं रिटेल महंगाई (CPI) भी मार्च में मामूली बढ़कर 3.4% पर पहुंच गई, हालांकि यह अभी भी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के 4% के लक्ष्य से नीचे है। लेकिन, होलसेल महंगाई के ये आंकड़े एक चेतावनी जरूर हैं। अगर कच्चे तेल और ऊर्जा की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो आने वाले महीनों में आम आदमी के लिए खुदरा बाजार (consumer market) में भी कीमतें बढ़ने की आशंका है।