क्यों अटकी हैं भारत में तनख्वाहें?
भारत की अर्थव्यवस्था में अक्सर रोजगार सृजन और गिरती बेरोजगारी की बात होती है। लेकिन अगर करीब से देखें तो एक बड़ी चुनौती सामने आती है: तनख्वाहों में ठहराव (Stagnant Wages)। यहThe issue profoundly impacts employment quality and overall prosperity, suggesting the problem isn't a lack of jobs but suppressed incomes that trap many workers despite economic activity. The gap between job numbers and real wage stagnation points to deep structural problems. यानी, सिर्फ नौकरी का होना काफी नहीं है, असली कमाई का बढ़ना जरूरी है।
कम प्रोडक्टिविटी है असली वजह
भारत में सैलरी ग्रोथ रुकने की सबसे बड़ी वजह है विभिन्न सेक्टर्स में कम प्रोडक्टिविटी। कृषि, जो अभी भी 45% लोगों को रोजगार देता है, में प्रोडक्टिविटी फॉर्मल नॉन-फार्म सेक्टर के मुकाबले काफी कम है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की प्रोडक्टिविटी ग्रोथ भी 2019-2023 के बीच घटकर महज 0.4% सालाना रह गई, जो 2013-2018 के 5.5% से काफी कम है। प्रोडक्टिविटी का यह गैप सीधे तौर पर तनख्वाहों को बढ़ने से रोकता है।
महंगाई खा रही है बढ़ी हुई कमाई
Periodic Labour Force Survey (PLFS) और Labour Bureau के डेटा बताते हैं कि असली वेज (Real Wages) या तो स्थिर हैं या गिर रहे हैं। भले ही नॉमिनल वेज (Nominal Wages) थोड़ा बढ़े, लेकिन महंगाई (Inflation) अक्सर इन बढ़त को खत्म कर देती है। 2022-2025 के बीच, असली रेगुलर वेज में सालाना सिर्फ 1.2% की मामूली ग्रोथ देखी गई, जो 2011-12 के स्तर से भी नीचे है। वहीं, कैजुअल वर्कर्स, खासकर ग्रामीण पुरुषों की असली कमाई में इसी अवधि में करीब 3% प्रति वर्ष की गिरावट आई है।
इनफॉर्मल सेक्टर का बुरा हाल
देश के लगभग 90% वर्कफोर्स को रोजगार देने वाला इनफॉर्मल सेक्टर सबसे ज्यादा इस समस्या से जूझ रहा है। यहां कई लोग हर महीने ₹10,000 से भी कम कमा रहे हैं और उन्हें किसी तरह की सोशल सिक्योरिटी का लाभ नहीं मिलता।
नए लेबर लॉज़ पर भी सवाल
नवंबर 2025 में भारत सरकार ने चार नए लेबर कोड्स (Labour Codes) लागू किए हैं, जिनका मकसद 29 पुराने कानूनों को सरल बनाना और वर्किंग कंडीशन सुधारना है। लेकिन Manish Sabharwal जैसे एक्सपर्ट्स का मानना है कि सिर्फ कानून बदलने से सैलरी ग्रोथ की समस्या हल नहीं होगी। उनका कहना है कि आर्टिफिशियल मिनिमम वेज बढ़ाने से सिर्फ कुछ लोगों को फायदा होगा और फॉर्मलाइजेशन को बढ़ावा नहीं मिलेगा। इन कोड्स का असली असर प्रोडक्टिविटी बढ़ने पर ही निर्भर करेगा।
रुकी हुई सैलरी ग्रोथ के खतरे
लगातार कम सैलरी ग्रोथ से देश में आय असमानता (Income Inequality) गहरा सकती है, जिससे सामाजिक अशांति और डोमेस्टिक कंजम्पशन (घरेलू खपत) में कमी आ सकती है। वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देश भारत से ज्यादा लेबर प्रोडक्टिविटी ग्रोथ दिखा रहे हैं, जो ज्यादा इन्वेस्टमेंट आकर्षित कर सकते हैं। गिग इकॉनमी (Gig Economy) में फ्लेक्सिबिलिटी तो है, पर इसमें काम करने वाले कई लोग ₹15,000 से कम कमा रहे हैं और उनके पास भी सोशल सिक्योरिटी नहीं है।
आगे का रास्ता क्या है?
आने वाले फाइनेंशियल ईयर में भारत की GDP ग्रोथ 6.8% से 7.4% रहने का अनुमान है, जिसका मुख्य आधार डोमेस्टिक डिमांड होगी। लेबर मार्केट में भी पार्टिसिपेशन बढ़ रहा है और बेरोजगारी कम हो रही है। लेकिन असली वेज ग्रोथ की समस्या बनी हुई है। इसे सुलझाने के लिए लोगों को कम प्रोडक्टिविटी वाले कृषि क्षेत्र से निकालकर ज्यादा सैलरी वाले नॉन-फार्म जॉब्स में भेजना होगा। इंडस्ट्री की जरूरत के हिसाब से स्किल्स को बढ़ाना और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा देना होगा। इन बुनियादी स्ट्रक्चरल मुद्दों को हल किए बिना, भारत की मजबूत GDP ग्रोथ का फायदा आम आदमी तक नहीं पहुंचेगा।
