मार्च के महीने में India के होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) में जो 3.88% की उछाल देखी गई है, वह पिछले 38 महीनों का सबसे बड़ा आंकड़ा है। इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है, खासकर उत्पादन की लागत (production cost) को तेजी से बढ़ा रहा है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tension) और कच्चे तेल (crude oil) की सप्लाई में आ रही दिक्कतों के चलते कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में महीने-दर-महीने (month-on-month) 49.1% का भारी इजाफा हुआ है। इसी के साथ ईंधन और बिजली की लागत में भी तेजी देखी गई है। पेट्रोकेमिकल उत्पादों के दाम भी काफी बढ़े हैं।
इस भारी लागत दबाव का सामना उत्पादकों को सीधे तौर पर करना पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्लास्टिक क्षेत्र की आधी से ज़्यादा छोटी और मध्यम दर्जे की इकाइयाँ (MSMEs) इस असहनीय मार्जिन दबाव के कारण अपना उत्पादन रोक चुकी हैं या उसमें कटौती कर चुकी हैं। आने वाले समय में प्लास्टिक उत्पादों की कीमतों में भी काफी बढ़ोतरी की उम्मीद है।
हालांकि, खुदरा महंगाई (retail inflation), यानी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI), मार्च में अपेक्षाकृत मामूली रूप से बढ़कर 3.4% हुआ। इससे यह संकेत मिलता है कि फिलहाल उत्पादक लागत का कुछ बोझ खुद उठा रहे हैं, लेकिन यह स्थिति ज़्यादा दिनों तक बने रहने की संभावना नहीं है। अगर ये बढ़ी हुई लागतें उपभोक्ताओं तक पहुँचीं, तो मांग में गिरावट आ सकती है, जो GDP ग्रोथ के अनुमानों पर और दबाव डालेगी।
वैश्विक स्तर पर, कच्चे तेल की कीमतों में उबाल है। पश्चिम एशिया में जारी संकट इस स्थिति का मुख्य कारण है, जिसने अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है। India का औसत कच्चा तेल का दाम मार्च में फरवरी की तुलना में 60% से भी ज़्यादा बढ़ा। Q2 2026 तक इसके $115 प्रति बैरल के शिखर पर पहुँचने का अनुमान है। इससे न केवल औद्योगिक सामग्री बल्कि रोजमर्रा की चीज़ों के दाम भी बढ़ने की आशंका है।
ऐतिहासिक तौर पर, तेल की कीमतों में ऐसे झटकों का India की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है, जिसमें उच्च महंगाई, ट्रेड डेफिसिट में बढ़ोतरी और करेंसी का कमजोर होना शामिल रहा है।
यह मौजूदा स्थिति भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को एक दुविधा में डालती है। एक तरफ जहाँ महंगाई बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय बैंक को संभावित ब्याज दर वृद्धि (rate hike) के आर्थिक विकास के अनुमानों पर पड़ने वाले असर को भी तौलना होगा।
इस बढ़ती महंगाई के साथ 'स्टैगफ्लेशन' (stagflation) का खतरा भी मंडरा रहा है, जहाँ उच्च महंगाई के साथ आर्थिक विकास धीमा या गिरता हुआ नज़र आता है। कोर मैन्युफैक्चरिंग गुड्स (core manufactured goods) के थोक दाम 41 महीने के उच्च स्तर पर हैं। ऊर्जा आयात पर निर्भर India जैसे देशों पर पश्चिम एशिया संकट का असर 'बहुत ज़्यादा विषम' (highly asymmetric) बताया जा रहा है। लगातार ऊँचे तेल आयात बिल से India के बजट डेफिसिट पर दबाव बढ़ेगा, जिससे करेंसी कमजोर हो सकती है और कर्ज की लागत बढ़ सकती है।
IMF, World Bank और RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए अपनी ग्रोथ फोरकास्ट (growth forecasts) जारी की हैं, जो 6.5% (IMF) से लेकर 6.9% (RBI) तक हैं। RBI ने हाल ही में अपनी रेपो रेट को 5.25% पर बरकरार रखा है, लेकिन FY27 के लिए CPI महंगाई का अनुमान 4.6% जताया है, जिसमें ऊँची ऊर्जा कीमतों और अल नीनो (El Niño) जैसे संभावित जोखिमों का ज़िक्र है। ICRA का अनुमान है कि अप्रैल 2026 तक WPI महंगाई 4.8% तक पहुँच सकती है। ऊँची ऊर्जा कीमतें और सप्लाई चेन की दिक्कतें दर्शाती हैं कि आने वाले समय में महंगाई एक बड़ी चिंता बनी रहेगी, और जारी आर्थिक सुधार को बचाने के लिए सावधानीपूर्वक नीतियों की आवश्यकता होगी।